अनदेखी नायिका: लक्ष्मी भोइर

14 घंटे की मेहनत, फिर भी चेहरे पर मुस्कान

सुबह से पहले जागती एक ज़िंदगी की कहानी

मधु चौधरी, मुंबई

आजकल जब भी हम महिला उद्यमियों, कामकाजी महिलाओं या समाज में महिलाओं के योगदान की बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में आईटी प्रोफेशनल, बैंकर, बिजनेस वुमन, शिक्षिका, लेखिका या राजनीति में मुकाम हासिल करने वाली महिलाओं की ही तस्वीर उभरती है. आज धरती से लेकर आसमान तक शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहाँ महिलाएँ न हों. लेकिन अगर गौर करें, तो अक्सर समाज के उच्च या मध्यम वर्ग की महिलाओं की सफलता और उनके योगदान की ही चर्चा और प्रशंसा होती है. निचले तबके की वे महिलाएँ, जो हर दिन कड़ी मेहनत करती हैं, उनके काम को शायद ही कभी उसी तरह से ग्लोरीफाई किया जाता है. घरों में काम करने वाली हाउस हेल्प को तो हम थोड़ा-बहुत रिकग्नाइज कर लेते हैं, लेकिन उन महिलाओं पर हमारी नज़र अक्सर नहीं जाती, जो रोज़ सुबह-सुबह मंडी से सब्ज़ी, फल या फूल खरीदकर हर मौसम में सड़क किनारे बेचती हैं. इनके द्वारा लाई सब्जियां कोल्ड स्टोरेज से नहीं बल्कि एकदम ताजा होती है। इसलिए लोग इनसे सब्जी खरीदने के लिए इंतजार भी करने में परहेज नहीं करते।
समाज में उनका योगदान किसी से कम नहीं, फिर भी उनकी मेहनत अक्सर गुमनाम रह जाती है. मुंबई जैसे महानगर में, जहाँ हर कदम पर भागदौड़ है, वहीं आसपास के गाँवों से आने वाली ये महिलाएँ ताज़ा सब्ज़ियाँ, फल और फूल लेकर सुबह-सुबह पहुँच जाती हैं और कुछ ही घंटों में अपना सारा सामान बेचकर लौट जाती हैं. इसी अनदेखे संघर्ष को सामने लाने के लिए जुझारू और मेहनतकश महिला लक्ष्मी गोपाल भोइर की कहानी को कलमबद्ध किया है. हमारी लेखिका मधु चौधरी ने……
सुबह से पहले शुरू होता एक दिन
रात के सन्नाटे में, जब शहर नींद में डूबा होता है, तब सफाले (जिला पालघर) की लक्ष्मी गोपाल भोइर अपने दिन की शुरुआत कर चुकी होती हैं. घड़ी में रात के दो बजते हैं, और वह बिना किसी शिकायत के अपने काम पर निकल पड़ती हैं. पिछले लगभग 30 वर्षों से लक्ष्मी यही काम कर रही हैं. वह मंडी से ताज़ी सब्ज़ियाँ खरीदती हैं, उन्हें टेंपो में लादकर सफाले से बोरीवली तक का लंबा सफर तय करती हैं, और सुबह होते-होते अपनी दुकान सजा लेती हैं. जैसे ही सूरज निकलता है, उनके पास ग्राहक आने लगते हैं. लेकिन यहाँ एक अलग ही माहौल होता है. यह केवल खरीद-बिक्री का संबंध नहीं, बल्कि विश्वास और अपनेपन का रिश्ता है. ग्राहक उनकी प्रतीक्षा करते हैं, कई बार मदद भी करते हैं और बिना हिसाब जाँचे उन पर भरोसा कर लेते हैं. लक्ष्मी मुस्कुराते हुए कहती हैं-अगर कभी थोड़ी-बहुत गलती हो भी जाए, तो मेरे ग्राहक अपने ही हैं. लक्ष्मी ने कभी औपचारिक शिक्षा नहीं ली, लेकिन उनका हिसाब-किताब बेहद सटीक है. सब्ज़ियाँ थैली में डालते हुए वे तेजी से जोड़-घटाव करती जाती हैं.यह हुनर उन्होंने किसी किताब से नहीं, बल्कि जीवन के अनुभव से सीखा है.
14 घंटे की मेहनत, बिना शिकायत
रात 2 बजे से शुरू होकर उनका दिन दोपहर के लगभग 4 बजे खत्म होता है । लगभग 14 घंटे की लगातार मेहनत. हफ्ते में पाँच दिन यही दिनचर्या चलती है. पूछने पर कि क्या कभी उन्होंने यह काम छोड़ने का सोचा, उनका जवाब बेहद सादा है. नहीं, मुझे यह काम अच्छा लगता है.
कमाई से बढ़कर सम्मान
दिनभर की मेहनत से लक्ष्मी लगभग 1500 से 2000 रुपये कमा लेती हैं, लेकिन उनके लिए असली कमाई है. सम्मान और विश्वास.ग्राहक न सिर्फ उन पर भरोसा करते हैं, बल्कि कई बार उनके लिए खाने-पीने की चीज़ें ( उनकी लाई हुई कैरी का अचार) बनाकर भी लेकर आते हैं, वे कहती हैं सब ऊपर वाले की मेहरबानी है, मेरे ग्राहक बहुत अच्छे हैं. मुझे बहुत प्यार बहुत सम्मान देते हैं। मेरे काम में मुश्किलें भी हैं, पर हौसले मजबूत ।
लक्ष्मी सब्ज़ियाँ पारंपरिक वाटे के हिसाब से बेचती हैं. उनके काम में सबसे बड़ी चुनौती बारिश का मौसम होता है, जब नुकसान की संभावना बढ़ जाती है. लेकिन इसके बावजूद उनके चेहरे पर कोई शिकायत नहीं दिखती.इतनी मेहनत और जिम्मेदारियों के बीच क्या उन्हें गुस्सा नहीं आता? इस सवाल पर वे बस हँस देती हैं
नहीं, मैं कभी गुस्सा नहीं करती..
लक्ष्मी गोपाल भोइर की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि असली महिला सशक्तिकरण केवल बड़े पदों और उपलब्धियों तक सीमित नहीं है.यह उन लाखों महिलाओं में भी जीवित है, जो हर दिन अपने श्रम, ईमानदारी और आत्मसम्मान के साथ जीवन को आगे बढ़ा रही हैं.

लेखिका के बारे में-

मधु चौधरी
एक बहुमुखी प्रतिभा की धनी साहित्यकार, शोधकर्ता और शिक्षिका हैं, जो हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। उन्होंने M.Com, ECCE और हिंदी साहित्य में M.A की शिक्षा प्राप्त कर अकादमिक उत्कृष्टता का परिचय दिया है। उनके दो लघु शोध आलेख प्रकाशित हो चुके हैं, जो उनके गहन अध्ययन और शोध दृष्टि को दर्शाते हैं।
वर्ष 2024–2025 में उन्होंने ICSSR के प्रोजेक्ट में रिसर्च असिस्टेंट के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया। लघुकथा, कविता, साक्षात्कार और आलेख जैसी विधाओं में उनकी रचनाएँ Live Wire Network पर प्रकाशित होती रही हैं। उनकी रचनात्मकता को ‘मेरी निहारिका’ (नवभारत टाइम्स) में प्रकाशित कविताओं के माध्यम से भी व्यापक पहचान मिली है। वर्तमान में वे ‘विरासत’ त्रैमासिक पत्रिका में सह-संपादक के रूप में अपनी साहित्यिक सेवाएँ दे रही हैं। साथ ही, सेंट पॉल कॉलेज ऑफ मास मीडिया एवं कम्युनिकेशन में अतिथि व्याख्याता के रूप में भी सक्रिय हैं। शायरी, व्यंग्य, लघुकथा और साक्षात्कार जैसी विधाओं में उनका लेखन संवेदनशीलता और गहराई से परिपूर्ण है। मुंबई के चित्रनगरी, मन का कोना और मकाम जैसे साहित्यिक मंचों से जुड़कर वे साहित्यिक गतिविधियों में निरंतर सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

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