Hindi Kahani
पीर की नदी
बहुत देर तक जंगल में भटके कृष की थकान झरने की कल-कल में घुलने लगी। तभी चट्टान पर झुकी एक पहाड़ी औरत दिखी। उसकी आँखों की पीड़ा कृष को अपनी लग रही थी। वे दोनों अलग भाषाएँ बोलते थे, पर दर्द की भाषा एक थी। इशारों और टूटे शब्दों के बीच दोनों अपनी-अपनी चुप चीखें उँडेलते रहे। वह भार, जो दिलों पर चट्टान बना बैठा था, धीरे-धीरे पिघलता चला गया। उस पल उन्हें समझ आया कि पीर को भाषा नहीं चाहिए .वह तो गूंगी होती है, पर हर अंग से बोलती रहती है।
कालू का दर्द
कालू नाम के कुत्ते की यह मार्मिक कहानी समाज के उस कड़वे सच को उजागर करती है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। एक हवेली के बाहर रहने वाला कालू जब एक मासूम बच्ची के साथ हुई निर्दयता देखता है, तो उसका मन व्यथित हो उठता है। उसकी मां मिल्की के शब्द इंसानों की दुनिया की कठोर सच्चाई को सामने लाते हैं जहां बच्चे भी भेदभाव का शिकार होते हैं। यह कहानी संवेदनाओं को झकझोरने वाली एक गहरी सामाजिक टिप्पणी है।
