माटी का इंसान
माटी का इंसान पत्थर के भगवान के पीछे भागते-भागते अपनी इंसानियत, अपनी मां और अपनी धरती का मान भूल बैठा यही कविता का सार है।”

माटी का इंसान पत्थर के भगवान के पीछे भागते-भागते अपनी इंसानियत, अपनी मां और अपनी धरती का मान भूल बैठा यही कविता का सार है।”
बच्चे रंग, खुशबू और उम्मीदों से भरे उस चमन के फूल हैं जिनकी नर्म हथेलियों पर उनकी पूरी तकदीर लिखी होती है। कहीं धूल-भरी मुट्ठियाँ हैं, कहीं हँसी से भरा बालपन और कहीं वही बचपन घरों में कैद होकर बहेलियों की निगाहों से डरता है। उनके मस्तक वात्सल्य से भीगने के लिए बने हैं, न कि भय से काँपने के लिए। पर सच यह है कि कुछ बच्चे शिक्षा के मंदिरों में बैठते हैं, जबकि कुछ बाहर मायूस खड़े रह जाते हैं.