बचपन को बाँहों में भर लो…

बच्चे रंग, खुशबू और उम्मीदों से भरे उस चमन के फूल हैं जिनकी नर्म हथेलियों पर उनकी पूरी तकदीर लिखी होती है। कहीं धूल-भरी मुट्ठियाँ हैं, कहीं हँसी से भरा बालपन और कहीं वही बचपन घरों में कैद होकर बहेलियों की निगाहों से डरता है। उनके मस्तक वात्सल्य से भीगने के लिए बने हैं, न कि भय से काँपने के लिए। पर सच यह है कि कुछ बच्चे शिक्षा के मंदिरों में बैठते हैं, जबकि कुछ बाहर मायूस खड़े रह जाते हैं.

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ऐसा होता तो कैसा होता…

कभी-कभी मन सोचता है अगर दुनिया हमारी इच्छाओं के हिसाब से चलती, तो कैसी होती?
शायद इतनी मीठी कि चॉकलेट, आइसक्रीम, बर्गर और पिज़्ज़ा खाकर भी जेब हल्की न होती।
शायद इतना आसान कि इतिहास और भूगोल की जगह कार्टून और गानों के इम्तिहान होते, जहाँ गलत जवाब देने पर भी मुस्कुराहट मिलती।
कल्पना की इस रंगीन दुनिया में हम हमेशा बच्चे रहते न चिंता, न बोझ, न कल की फिक्र।

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बचपन

बचपन के वे सुनहरे दिन छोटी-छोटी खुशियों से भरे थे काग़ज़ की कश्तियाँ, बरसात की लहरें और मासूम शरारतें। पर समय बदल गया; तकनीक और प्रतिस्पर्धा ने सरल मनों पर बोझ डाल दिया। जहाँ बच्चों को खुलकर उड़ना चाहिए था, वहीं आज उनके आस-पास चिंता, दबाव और अनचाही समझदारी के पहरे खड़े हैं। फिर भी आशा यही है कि बचपन अपने स्वच्छंद पंखों से उड़ान भरे और माता-पिता का मार्गदर्शन उन्हें सही दिशा दे।

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उड़ चलें फिर से मासूम पंखों पर

बचपन वह उम्र है, जब दुनिया का कोई ग़म साथ नहीं चलता। मासूमियत इतनी गहरी होती है कि हर डाँट भी प्यार लगती है और हर शरारत में एक बेफ़िक्री छुपी रहती है। बच्चे न गीत के सुर जानते हैं, न जिंदगी की डर-फिक्र फिर भी सबसे मधुर धुन वही गा लेते हैं। किसी पत्थर को उछालते हुए भी हँस देना, किसी अजनबी से भी अपना-सा रिश्ता बना लेना, यही उनकी अलमस्त दुनिया का जादू है।

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मासूम मुस्कानें

वो दिन कितने सुहाने थे. जब तुम छोटे-से बच्चे थे। खेलते–कूदते हुए हँसते-हँसते मेरी गोदी में चढ़ आते और मिट्टी में खेलकर अपने गालों पर रंग-सा बिखेर लेते। तुम्हारी वह मुस्कान मानो चारों ओर गुलाल-सी छा जाती। मैं तुम्हें गले लगाकर झूला झुलाती, और तुम्हारे लाड़-प्यार से घर में मानो खुशियों के मोती बिखर जाते। दौड़ते-दौड़ते जब तुम थककर मेरी बाँहों में सो जाते, तो लगता जैसे दुनिया की सारी शांति मुझे मिल गई हो।

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सफ़र

ऐ वक्त, ज़रा ठहर जा। मुझे अपने आप से कुछ बातें करनी हैं। यादों की किताब में बिखरे किस्सों को फिर से पढ़ना है। बचपन के उन दिनों को याद करना है जब बेख़ौफ़ होकर खेलते और रातों को आसमान में तारे गिनते थे। सखियों संग बिताए यौवन के मधुर पलों को जीना है, जब बातें करते-करते पहर बीत जाते थे। बाबुल का घर, अम्मा का आंचल और भाई-बहनों का साथ छूटने की कसक अब भी भीतर कहीं घुटती है। सात वचन लेकर शुरू हुए नवजीवन की यादें भी हैं, जो धीरे-धीरे गृहस्थी की उलझनों में बिखर गईं। बच्चों की किलकारियों से गूंजते घर का आनंद था, जिसमें रातें भी उजली लगती थीं। समय कैसे बीत गया, यह समझ ही नहीं आया। अब जीवन की भाग-दौड़ में, शेष बची स्मृतियों के सहारे, सफ़र मानो शून्य की ओर बढ़ता जा रहा है।

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हिसाब–किताब में कच्ची हूँ

मैं हिसाब–किताब में कच्ची हूँ, लेकिन दिल से अब भी बच्ची ही हूँ। जोड़-घटाना ज़्यादा नहीं आता और भाग भी कुछ कम ही आता है। किसको क्या दिया था, यह भी याद नहीं रहता क्योंकि दिमाग़ ज़्यादा लगाना मेरी आदत नहीं। मुझे बस थोड़े से सुकून की तलाश रहती है और उसके लिए मैं किसी के पीछे भागती नहीं। मेरी कोशिश यही रहती है कि खुशी के छोटे-छोटे पल कहीं छूट न जाएँ, इसलिए उन्हें अपनी मुट्ठी में कैद कर लेती हूँ। दुख के बीते पल मैं रेत की भाँति बहा देती हूँ। इस तरह, मुट्ठी में समाए हुए पल मेरे अपने हो जाते हैं और दुख के सारे पल पीछे ही छूट जाते हैं।

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कट चाय से कलम तक

“फटी सी कमीज़, नेकर, एक हाथ में चाय की केतली और दूसरे में कप… सीतलामाता बाज़ार के मजदूर चौक पर आवाज़ गूंजती—‘ए छोटू, दो कट भर दे!’ बचपन की वो सुबहें, जब पचास पैसे रोज़ की मजदूरी के लिए चाय बनाना, दुकान-दुकान चाय पहुंचाना और फिर स्कूल भागना… आज भी जब खुद के लिए चाय बनाता हूं, वो छोटू मुझमें अब भी ज़िंदा लगता है।”

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