उड़ चलें फिर से मासूम पंखों पर

विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद

बचपन हर गम से बेगाना होता है इसीलिए शायद उसका जीने का अंदाज सबसे अनोखा होता है। ना कोई डर,ना कोई फिकर। मस्ती ही मस्ती, देखो जिधर। रास्ते में चलते -चलते पत्थर को भी ठोकर में उड़ा देते हैं तो वही किसी की डांट को प्यार समझ गले से लगा लेते हैं ।यही मासूमियत उनकी उन्हे अलमस्त रखती है। कल क्या होगा बच्चे कभी सोचते ही नहीं। अभी तो मस्ती कर लूँ । यह वाले पल को तो जी लूँ । जब, जहाँ,जैसा, जितना मौका मिले वहीं कोई ना कोई शरारत बिंदास होकर कर लूं।

बेसुरे होते हुए भी सुर में गा लेना। हर किसी के साथ अपनेपन से जुड़ जाना बच्चों की खासियत होती है। बच्चे तेरा-मेरा कुछ नहीं जानते। उन्हें हर चीज़ अपनी लगती है। अपने पराए का भेद बड़ों ने उन्हें सिखाया। वह तो आजाद परिंदों की तरह खुले आसमान में ख्वाहिशों के पंख लगाकर उड़ना जानते हैं। कल्पना की रंगोली से धरा को रंगीन बना देते हैं ।रंगों की कलम से दीवारों को सजा देते हैं। पल में रूठे,पल में मान गए।हँसते- हँसते सबको अपना बनाने की कला जितनी बच्चों में है उतनी किसी में नहीं। बेझिझक अपनी बातों को किसी से भी कह देना यह पारदर्शिता भगवान बराबर सभी को देकर भेजता है, पर बड़े होते-होते हम दुनियादारी में उलझ कर रह जाते हैं। बच्चे थे तब तक सही मायने में सुलझे हुए थे।

आप भी बच्चे बनकर जब जी चाहे नाचें। जब मन चाहे किसी भी सुर में गुनगुनाएं। यकीन मानिए खुद को बहुत तरो-ताजा महसूस करेंगे।
हँसते-हँसते आँखों में आँसू आना
यकीनन मुझे याद आया है बचपन का वह जमाना।

तो चलिए एक बार फिर अपने भीतर के बच्चे को जगाते हैं और जब, जहाँ, जितना भी, जैसा भी मौका मिले बच्चा बनकर फिर से खिलखिलाते हैं।

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