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उड़ चलें फिर से मासूम पंखों पर

बचपन वह उम्र है, जब दुनिया का कोई ग़म साथ नहीं चलता। मासूमियत इतनी गहरी होती है कि हर डाँट भी प्यार लगती है और हर शरारत में एक बेफ़िक्री छुपी रहती है। बच्चे न गीत के सुर जानते हैं, न जिंदगी की डर-फिक्र फिर भी सबसे मधुर धुन वही गा लेते हैं। किसी पत्थर को उछालते हुए भी हँस देना, किसी अजनबी से भी अपना-सा रिश्ता बना लेना, यही उनकी अलमस्त दुनिया का जादू है।

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