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सफ़र

ऐ वक्त ठहर जा
दो पल को
कुछ बातें खुद से
करनी हैं
यादों की किताबों में
बिखरे
कुछ किस्से फिर से
पढ़ने हैं
पढ़ना है बचपन में कैसे
बेख़ौफ़ खेलते हंसते थे
और रात में कैसे
आसमान में
तारे देखा करते थे
सखियों के संग बीता कैसे
यौवन का वो
मधुरम पल
बातें करते करते कैसे
बीत गए दो चार पहर
कैसे छूटा बाबुल का घर
अम्मा का आंचल सुंदर
भाई बहन से अलग हो कैसे
घुटते हैं अंदर अंदर
कैसे सात वचन लेकर
शुरू किया
नवजीवन का सफ़र
उलझ गृहस्थी में कैसे
बिखर गए हैं तितर बितर
किलकारी की गूंज से कैसे
रात हो गई थी वासर
कैसे बचपन लौट के आया
गूंजा फिर से अट्टहास
भाग दौड़ में जाने कैसे
बीत रहा जीवन का सफ़र
अवशेषों में यादों के कैसे
शून्य हो रहा मेरा सफ़र।

निधि श्रीवास्तव, प्रसिद्ध लेखिका

2 thoughts on “सफ़र

  1. शून्य हो रहा है सफ़र…. वाह बहुत सुंदर भावों की अभिव्यक्ति निधि जी 👏👏

    1. जी धन्यवाद प्रयास की सराहना करने के लिए आपका आभार 🙏🏻

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