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ऐ वक्त कुछ पल ठहर जा…

ऐ वक्त, ज़रा ठहर तो सही। सदियों से मन में पलते प्रश्न तेरी तेज़ रफ़्तार के कारण अनकहे रह जाते हैं। मैं पूछना चाहती हूँ—कहाँ खो गई वह दुनिया, जहाँ हरियाली और खुशहाली थी, जहाँ पशु-पक्षियों तक में प्रेम और उल्लास था। सूरज की किरणों में वात्सल्य झलकता था, चाँदनी में प्रीत का अहसास बिखरा रहता था।

आज सब कुछ बदल गया है। इंसान इंसान का दुश्मन बन बैठा है, भावनाएँ सूख गई हैं, हमदर्दी लुप्त हो गई है और खुदगर्जी ही राज कर रही है। न मौसम ठीक है, न प्रकृति। हरियाली मिट रही है, खुशहाली खो रही है। इंसानियत बिन मौत ही मर रही है।

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सफ़र

ऐ वक्त, ज़रा ठहर जा। मुझे अपने आप से कुछ बातें करनी हैं। यादों की किताब में बिखरे किस्सों को फिर से पढ़ना है। बचपन के उन दिनों को याद करना है जब बेख़ौफ़ होकर खेलते और रातों को आसमान में तारे गिनते थे। सखियों संग बिताए यौवन के मधुर पलों को जीना है, जब बातें करते-करते पहर बीत जाते थे। बाबुल का घर, अम्मा का आंचल और भाई-बहनों का साथ छूटने की कसक अब भी भीतर कहीं घुटती है। सात वचन लेकर शुरू हुए नवजीवन की यादें भी हैं, जो धीरे-धीरे गृहस्थी की उलझनों में बिखर गईं। बच्चों की किलकारियों से गूंजते घर का आनंद था, जिसमें रातें भी उजली लगती थीं। समय कैसे बीत गया, यह समझ ही नहीं आया। अब जीवन की भाग-दौड़ में, शेष बची स्मृतियों के सहारे, सफ़र मानो शून्य की ओर बढ़ता जा रहा है।

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हिसाब–किताब में कच्ची हूँ

मैं हिसाब–किताब में कच्ची हूँ, लेकिन दिल से अब भी बच्ची ही हूँ। जोड़-घटाना ज़्यादा नहीं आता और भाग भी कुछ कम ही आता है। किसको क्या दिया था, यह भी याद नहीं रहता क्योंकि दिमाग़ ज़्यादा लगाना मेरी आदत नहीं। मुझे बस थोड़े से सुकून की तलाश रहती है और उसके लिए मैं किसी के पीछे भागती नहीं। मेरी कोशिश यही रहती है कि खुशी के छोटे-छोटे पल कहीं छूट न जाएँ, इसलिए उन्हें अपनी मुट्ठी में कैद कर लेती हूँ। दुख के बीते पल मैं रेत की भाँति बहा देती हूँ। इस तरह, मुट्ठी में समाए हुए पल मेरे अपने हो जाते हैं और दुख के सारे पल पीछे ही छूट जाते हैं।

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