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रात के शांत आकाश के नीचे हाथ में कलम लिए खड़ी एक भारतीय महिला, अंधकार और उम्मीद के बीच संवाद और उजाले की प्रतीकात्मक अनुभूति।

रात, कर न कुछ बात

यह कविता रात को केवल अंधकार नहीं मानती, बल्कि उसे एक साथी की तरह संबोधित करती है—जिससे संवाद कर, कलम के सहारे जीवन में उजाले और उम्मीद को आमंत्रित किया जा सके।

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सफ़र

ऐ वक्त, ज़रा ठहर जा। मुझे अपने आप से कुछ बातें करनी हैं। यादों की किताब में बिखरे किस्सों को फिर से पढ़ना है। बचपन के उन दिनों को याद करना है जब बेख़ौफ़ होकर खेलते और रातों को आसमान में तारे गिनते थे। सखियों संग बिताए यौवन के मधुर पलों को जीना है, जब बातें करते-करते पहर बीत जाते थे। बाबुल का घर, अम्मा का आंचल और भाई-बहनों का साथ छूटने की कसक अब भी भीतर कहीं घुटती है। सात वचन लेकर शुरू हुए नवजीवन की यादें भी हैं, जो धीरे-धीरे गृहस्थी की उलझनों में बिखर गईं। बच्चों की किलकारियों से गूंजते घर का आनंद था, जिसमें रातें भी उजली लगती थीं। समय कैसे बीत गया, यह समझ ही नहीं आया। अब जीवन की भाग-दौड़ में, शेष बची स्मृतियों के सहारे, सफ़र मानो शून्य की ओर बढ़ता जा रहा है।

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