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रात, कर न कुछ बात

रात के शांत आकाश के नीचे हाथ में कलम लिए खड़ी एक भारतीय महिला, अंधकार और उम्मीद के बीच संवाद और उजाले की प्रतीकात्मक अनुभूति।

अनिता अरोड़ा, लखनऊ

रात… कर न कुछ ऐसी बात,
मिट जाएँ पुराने ग़म सारे।

मेरी एक बात सुन,
क्यों रहती अंधियारे में?
क्या तुझे भी सताता है कोई ग़म?

कुछ अपनी दास्ताँ सुना मुझे,
दोस्ती कर ले बस मुझसे।

मैं तुझे उजाला दिखाऊँगी,
तेरे जीवन में खुशियाँ लाऊँगी।

तेरा तम सदा के लिए दूर कर दूँगी।

हाँ… कलम ऐसी चलाऊँगी,
तेरे जीवन से सारा तम दूर कर दूँगी।
खुशियाँ ही खुशियाँ, उजाला ही उजाला
भर दूँगी तेरे जीवन में।

हाँ… आ रात, कर न कुछ बात।
रात, कर न कुछ बात मुझसे।

2 thoughts on “रात, कर न कुछ बात

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