लालटेन

गाँव की छोटी-सी झोंपड़ियों और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को उजागर करती है। अँधियारे में एक मृतप्राय दीपशिखा की तरह जीवन की झलक कहीं तहखाने में बंद पड़ी है। नेता केवल दिखावे के लिए चमक-धमक करते हैं, पर जब बत्ती बुझी होती है तो लालटेन भी घर को रोशन नहीं कर सकती। इसके बावजूद, झोपड़ी में रहने वाले कृशकाय लोग रातों को इस छोटी डिबरी-सी लालटेन की रौशनी से जीवन की आशा और संघर्ष को देख पाते हैं। यह कविता सामाजिक असमानता, संघर्ष और छोटे प्रकाश की महत्वता को सुंदर ढंग से चित्रित करती है।

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शमा और जिंदगी

काली रात में थरथराती हुई शमा की लौ अपने सपनों का प्रकाश लेकर जलती रहती है, चाहे हवा के झोंके उसे बुझाने की कोशिश करें। इसी तरह, ज़िंदगी भी निरंतर संघर्ष और कठिनाइयों के बीच आशाओं के साथ खड़ी रहती है। शमा दूसरों के अंधकार को दूर करने के लिए जलती है, और ज़िंदगी अपने पथ पर सपनों को आगे बढ़ाने के लिए बढ़ती रहती है। लौ का कंपकंपाना डर और अस्थिरता का प्रतीक है, लेकिन बुझने से पहले यह सौ गुना उजाला फैलाती है। शमा और जीवन दोनों यही सिखाते हैं—जलते रहो, उजागर रहो, संघर्ष और प्रकाश को अपनाओ, क्योंकि हर रात के बाद प्रभात अवश्य आता है।

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रात, कर न कुछ बात

रात… आज कुछ बात कर। ऐसी बात, जो पुराने सारे ग़म मिटा दे। एक बार मेरी सुन — तू हमेशा अंधेरे में क्यों रहती है? क्या तुझे भी कोई दर्द सताता है?
आ, अपनी कहानी मुझे सुना। चल, मुझसे दोस्ती कर ले। मैं तुझे उजाले से मिलवाऊँगी। तेरे जीवन में खुशियाँ भर दूँगी। ऐसा उजाला लाऊँगी कि तेरे भीतर का अंधकार हमेशा के लिए मिट जाएगा।
मैं अपनी कलम से तेरे जीवन की हर उदासी मिटा दूँगी। वहाँ सिर्फ उजाला होगा, मुस्कानें होंगी — हर कोना रोशन होगा।तो आ, रात… बस एक बार कुछ बात कर। मुझसे बात कर।

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