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रात के शांत आकाश के नीचे हाथ में कलम लिए खड़ी एक भारतीय महिला, अंधकार और उम्मीद के बीच संवाद और उजाले की प्रतीकात्मक अनुभूति।

रात, कर न कुछ बात

यह कविता रात को केवल अंधकार नहीं मानती, बल्कि उसे एक साथी की तरह संबोधित करती है—जिससे संवाद कर, कलम के सहारे जीवन में उजाले और उम्मीद को आमंत्रित किया जा सके।

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