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कल, और आज़

कल और आज़—दोनों समय की धुरी पर खड़े हैं। जो पल बीत गया, वह केवल स्मृति है, खट्टे-मीठे अनुभवों और तीखे शब्दों से भरा हुआ। वह कल मेरा प्रारब्ध नहीं बन सका, इसलिए उसे थामे रहना व्यर्थ है। आज़, जो अभी मेरी साँसों में धड़क रहा है, वही सच्चा गीत है, वही वास्तविक उत्सव है। आज़ ही वह क्षण है जो मुझे आनंदित कर रहा है, जो मुझे जीने का कारण दे रहा है। इसलिए कल की ओर लौटकर पछताने से बेहतर है कि आज़ को पकड़कर जिया जाए।

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स्वर्ग इसी जहाँ में

मनुष्य का असली मूल्य तभी है जब वह जीवन के अंधकार से उजाले की ओर बढ़ सके। अगर हम मृत्यु की चादर को हटाकर जीवन को नयी सुबह दे सकें, तभी हमारा अस्तित्व सार्थक है।
सच्चा जीवन वही है जहाँ हम प्रेम की एक बूँद पी भी सकें और किसी और को पिला भी सकें। जहाँ गिरने वाले को उठाने का सामर्थ्य हो, मुश्किलों में गीत गाने का साहस हो।
अगर हम अपने घर–आँगन को स्वर्ग में न बदल पाएँ, यदि दो दिलों की दूरियाँ कम न कर पाएँ, भूख से लड़ने के लिए रोटियाँ न जुटा पाएँ, और अन्याय देखते हुए भी आँख न उठा पाएँ—तो फिर चाँद पर जाने का क्या लाभ? ऐसे में हमें इंसान कहलाने का भी अधिकार नहीं।

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अजन्‍मी बेटी के सवाल

यह कविता एक अजन्मी बेटी की मार्मिक पुकार है, जो अपनी मां से सवाल करती है कि उसने जन्म से पहले ही उसकी जीवन-रेखा क्यों मिटा दी। वह बताती है कि वह तो मां की धड़कन भर थी, फिर भी उसे क्यों बोझ समझा गया। बेटे की चाह में मां ने समाज के उसूलों को मान लिया, पापा और दादी की तरह उसने भी बेटी के आने को नापसंद किया। वह कल्पना करती है कि अगर उसे जन्म मिला होता, तो वह सुनीता विलियम्स, कल्पना चावला, इंदिरा गांधी, किरण बेदी, साक्षी मलिक या पी. वी. सिंधु जैसी बनकर मां का नाम रोशन कर सकती थी। अंत में, वह कहती है कि अगर मां ने थोड़ा सा प्यार दिया होता, तो वह अपना पूरा जीवन मां की सेवा और सपनों को पूरा करने में लगा देती, लेकिन उसकी इच्छाओं को अनदेखा कर दिया गया। यह रचना बेटियों के प्रति समाज में फैली कुप्रथाओं और भ्रूण हत्या पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगाती है।

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