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उम्मीद की किरण

सब कुछ बदलता है, और जब समय रोगग्रस्त हो जाता है, तो समाज भी अपने अंदर रोग छुपाए रहता है। दिलों में प्यार की कमी और भेदभाव का विष फैलता है, शांति पर चोट पहुँचती है और अशांति का बोलबाला होता है। भूख और पीड़ा में घिरी मासूम बच्ची इसका प्रतीक है—सूखे स्तन और अमुक्त शरीर से उसकी प्यास कैसे बुझेगी? ना ऊपर कोई छत है, ना कोई आवरण। यह समय रोगग्रस्त है, हवा भी विचलित है, लेकिन फिर भी कहीं न कहीं उम्मीद की एक किरण जलती रहती है।

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गीता उठा

क्यों रंगहीन हो जीवन तेरा, देखोयह बनफूल फिर से महक उठा। पियुष पी कर हो रहे जो उन्मत्त तब,विषधर की कल्पना से मैं जी उठा। रजत-कंचन ही है, चमकते सोच मत,आग में यूँ ती नहीं, वो जल उठा। अधर्म की जब-जब हो विजय,कर सामना तू धर्म का, धनुष उठा। क्यों दीन-हीन यूँ बन बैठे हो,जरा…

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लालटेन

गाँव की छोटी-सी झोंपड़ियों और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को उजागर करती है। अँधियारे में एक मृतप्राय दीपशिखा की तरह जीवन की झलक कहीं तहखाने में बंद पड़ी है। नेता केवल दिखावे के लिए चमक-धमक करते हैं, पर जब बत्ती बुझी होती है तो लालटेन भी घर को रोशन नहीं कर सकती। इसके बावजूद, झोपड़ी में रहने वाले कृशकाय लोग रातों को इस छोटी डिबरी-सी लालटेन की रौशनी से जीवन की आशा और संघर्ष को देख पाते हैं। यह कविता सामाजिक असमानता, संघर्ष और छोटे प्रकाश की महत्वता को सुंदर ढंग से चित्रित करती है।

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शमा और जिंदगी

काली रात में थरथराती हुई शमा की लौ अपने सपनों का प्रकाश लेकर जलती रहती है, चाहे हवा के झोंके उसे बुझाने की कोशिश करें। इसी तरह, ज़िंदगी भी निरंतर संघर्ष और कठिनाइयों के बीच आशाओं के साथ खड़ी रहती है। शमा दूसरों के अंधकार को दूर करने के लिए जलती है, और ज़िंदगी अपने पथ पर सपनों को आगे बढ़ाने के लिए बढ़ती रहती है। लौ का कंपकंपाना डर और अस्थिरता का प्रतीक है, लेकिन बुझने से पहले यह सौ गुना उजाला फैलाती है। शमा और जीवन दोनों यही सिखाते हैं—जलते रहो, उजागर रहो, संघर्ष और प्रकाश को अपनाओ, क्योंकि हर रात के बाद प्रभात अवश्य आता है।

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