
रेखा हजारिका, लखीमपुर (आसाम)
सब कुछ बदलता है,
समय जब रोगग्रस्त होता है,
समाज भी रोगमय हो जाता है।
दिलों में प्यार की कमी,
भेदभाव का विष बहता है,
शांति को चोट पहुँचती है,
अशांति का जय-जयकार होता है।
भूख की आग,
अमुक्त शरीर,
सूखे स्तन से
कैसे बुझेगी लाल की प्यास?
ना छत है ऊपर,
ना कोई आवरण।
बच्ची को कौन बचाए,
पीसास जश्न मनाए?
यह समय रोगग्रस्त है,
हवा भी विस्मित है,
लेकिन उम्मीद की किरण
अभी भी कहीं जलती है।

खूबसूरत सृजन
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सुरेश परिहार, लाइव वॉयर न्यूज