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उम्मीद की किरण

सब कुछ बदलता है, और जब समय रोगग्रस्त हो जाता है, तो समाज भी अपने अंदर रोग छुपाए रहता है। दिलों में प्यार की कमी और भेदभाव का विष फैलता है, शांति पर चोट पहुँचती है और अशांति का बोलबाला होता है। भूख और पीड़ा में घिरी मासूम बच्ची इसका प्रतीक है—सूखे स्तन और अमुक्त शरीर से उसकी प्यास कैसे बुझेगी? ना ऊपर कोई छत है, ना कोई आवरण। यह समय रोगग्रस्त है, हवा भी विचलित है, लेकिन फिर भी कहीं न कहीं उम्मीद की एक किरण जलती रहती है।

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अधूरी बारिश की दास्तान

गाँव का पता ही भूल गया हो। बादल चिट्ठियों की तरह आते हैं, लेकिन बिना संदेश दिए लौट जाते हैं। जिन पर “देवभूमि” लिखा होता है, वहाँ तो मेघदूत की तरह वे आँसू और वज्र के साथ बरसते हैं, पर यहाँ आँगन उमस और प्रतीक्षा में सूखा पड़ा है। खपरैल की छतें अब भी बारिश का पानी सोखने को तैयार बैठी हैं, और पेड़ों से पत्ते पीले होकर झरते जा रहे हैं। इस चित्रण में वर्षा की अनुपस्थिति केवल मौसम का अभाव नहीं है, बल्कि एक गहरी भावनात्मक कमी और विरह का प्रतीक बन जाती है।

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