इल्तज़ा

पंख थक गए हैं, तो एक बार मिलने आ जाओ। मैं भी कभी स्वच्छंद पंछी जैसा था। आंसुओं के समंदर को मत रोको, उन्हें वैसे ही बहने दो जैसे सावन की झड़ी बहती है। लिखे हुए खतों की सौगात शायद कोई लौटाए, लेकिन वही कमाल का जिगर ए यार होगा, जैसा मैं हूं। किताबों पर धूल जमने से कहानी नहीं बदलती, और मैं भी कभी पुरानी किताबों को पढ़ने जैसा हूं। आज तक कौन गया है इस मिट्टी के आगे? मैं भी उस धूल के मुख़्तसर ज़र्रे जैसा हूं। जानते हैं, लौटते वक्त कुछ भी साथ में नहीं ले जा सकते, फिर भी बचा लो यारों, थोड़ा सरण और कफ़न जैसा…

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उम्मीद की किरण

सब कुछ बदलता है, और जब समय रोगग्रस्त हो जाता है, तो समाज भी अपने अंदर रोग छुपाए रहता है। दिलों में प्यार की कमी और भेदभाव का विष फैलता है, शांति पर चोट पहुँचती है और अशांति का बोलबाला होता है। भूख और पीड़ा में घिरी मासूम बच्ची इसका प्रतीक है—सूखे स्तन और अमुक्त शरीर से उसकी प्यास कैसे बुझेगी? ना ऊपर कोई छत है, ना कोई आवरण। यह समय रोगग्रस्त है, हवा भी विचलित है, लेकिन फिर भी कहीं न कहीं उम्मीद की एक किरण जलती रहती है।

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अजन्‍मी बेटी के सवाल

यह कविता एक अजन्मी बेटी की मार्मिक पुकार है, जो अपनी मां से सवाल करती है कि उसने जन्म से पहले ही उसकी जीवन-रेखा क्यों मिटा दी। वह बताती है कि वह तो मां की धड़कन भर थी, फिर भी उसे क्यों बोझ समझा गया। बेटे की चाह में मां ने समाज के उसूलों को मान लिया, पापा और दादी की तरह उसने भी बेटी के आने को नापसंद किया। वह कल्पना करती है कि अगर उसे जन्म मिला होता, तो वह सुनीता विलियम्स, कल्पना चावला, इंदिरा गांधी, किरण बेदी, साक्षी मलिक या पी. वी. सिंधु जैसी बनकर मां का नाम रोशन कर सकती थी। अंत में, वह कहती है कि अगर मां ने थोड़ा सा प्यार दिया होता, तो वह अपना पूरा जीवन मां की सेवा और सपनों को पूरा करने में लगा देती, लेकिन उसकी इच्छाओं को अनदेखा कर दिया गया। यह रचना बेटियों के प्रति समाज में फैली कुप्रथाओं और भ्रूण हत्या पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगाती है।

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