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लालटेन

गाँव की छोटी-सी झोंपड़ियों और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को उजागर करती है। अँधियारे में एक मृतप्राय दीपशिखा की तरह जीवन की झलक कहीं तहखाने में बंद पड़ी है। नेता केवल दिखावे के लिए चमक-धमक करते हैं, पर जब बत्ती बुझी होती है तो लालटेन भी घर को रोशन नहीं कर सकती। इसके बावजूद, झोपड़ी में रहने वाले कृशकाय लोग रातों को इस छोटी डिबरी-सी लालटेन की रौशनी से जीवन की आशा और संघर्ष को देख पाते हैं। यह कविता सामाजिक असमानता, संघर्ष और छोटे प्रकाश की महत्वता को सुंदर ढंग से चित्रित करती है।

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अधूरी बारिश की दास्तान

गाँव का पता ही भूल गया हो। बादल चिट्ठियों की तरह आते हैं, लेकिन बिना संदेश दिए लौट जाते हैं। जिन पर “देवभूमि” लिखा होता है, वहाँ तो मेघदूत की तरह वे आँसू और वज्र के साथ बरसते हैं, पर यहाँ आँगन उमस और प्रतीक्षा में सूखा पड़ा है। खपरैल की छतें अब भी बारिश का पानी सोखने को तैयार बैठी हैं, और पेड़ों से पत्ते पीले होकर झरते जा रहे हैं। इस चित्रण में वर्षा की अनुपस्थिति केवल मौसम का अभाव नहीं है, बल्कि एक गहरी भावनात्मक कमी और विरह का प्रतीक बन जाती है।

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