
नीमा शाह, अहमदाबाद
प्रेम और चाहत दोनों
दिल की ही धड़कन से जन्म लेते हैं,
पर उनकी गहराई में
अलग-अलग रंग बसते हैं।
चाहत होती है एक प्यास,
किसी को पाने की आस,
जिसमें दिल अपने हिस्से की
खुशियाँ ढूँढता है हर साँस।
पर प्रेम…
प्रेम तो वो एहसास है,
जहाँ खुद को भूल जाना भी
एक मीठा-सा विश्वास है।
उसकी मुस्कान में ही
अपनी दुनिया बस जाती है,
उसकी खुशी ही फिर
दिल का सुकून बन जाती है।
चाहत बदल जाती है अक्सर
वक्त की चाल के साथ,
पर सच्चा प्रेम तो चलता है
हर दूरी, हर हालात के साथ।
खामोशियों में भी वो
उतना ही गहरा रहता है,
जो शब्दों से न कह पाए,
वो दिल चुपचाप कहता है।
इन रचनाओं को भी पढ़ें और अपनी टिप्पणी दें-
ब्लैकवुड वैली
गहराइयों में छिपी सच्चाई
गांव की माटी की वो खुशबू

One thought on “प्रेम और चाहत”