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जुल्फ़ तेरी

चाँदनी रात में हवा में लहराते लंबे बालों वाली महिला, जिसके आसपास भावनात्मक और रहस्यमयी माहौल है

डॉ. किरण अग्रवाल, अनूपनगर (मध्यप्रदेश)

तेरी जुल्फ़ें
कसीदे काढ़ने लगीं
मेरी उल्फत के
सुनहरे ख़्वाबों के,
सुलगते जज़्बातों के
कोरे पन्नों पर
अपना नाम लिखकर।

एक हवा का झोंका,
तेरी रूपहली,
सुनहरी
ख़ुशबू से सराबोर मैं।

छाँव
दिल के
पहलू से
लिपटकर
मुझे अपनी आग़ोश में
पनाह दे रही है।

जादू-सा
खोकर रह गया,
सारी कायनात का सुकून
तुझसे ही मिला जैसे।

तेरे गेसुओं से टपकते
इन मोतियों को
लबों से पी लिया जैसे,
जैसे बारिश में भीग रहा
मन,
जैसे
सुलगते अंगार में
छन-छन कर
गुज़र गई रात।

ओस की बूँदें
पिघल रही थीं।
चाँदनी रात में
दहलीज़ पर
दस्तक दे रहा
कौन…?
कौन
बिजली-सी कौंध गई?

कोरे पन्नों पर लिखी इबारत
धूँ-धूँ कर
जल गई।

काली, घनी-सी
रात जाने कहाँ गई।
आँखें पत्थर -सी,
तन-मन कुचल दिया,
जैसे,
जैसे
तिरोहित कर दिया
गरल,
मौन,
समर्पण,
अर्पण…

कुंठित
जीवन
शेष
कुछ…?
कनखियों से
तकता।

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