बहना ही जीवन है

“पत्थरों से टकराकर भी जो मुस्कुराना सीख जाए… वही जिंदगी को समझ पाता है

डॉ. रुपाली गर्ग, मुंबई

पहाड़ की चुप्पी को तोड़ता,
एक मधुर स्वर-सा गूंजता है।
वो कोई गीत नहीं,
एक झरना है जो बहता है।

पत्थरों से टकराकर भी
जिसने मुस्कुराना सीखा,
हर गिरावट को अपनाकर
आगे बढ़ जाना सीखा।

उसकी हर बूँद में जैसे
किसी दिल की कहानी है
कभी हँसी की हल्की धुन,
कभी आँखों की पुरानी नमी है।

थका हुआ जब मन होता है,
उसके पास ठहर जाता है।
उसकी शीतल बाहों में
हर दर्द पिघल जाता है।

न कोई शिकायत, न कोई सवाल,
बस बहना ही उसका उत्तर है
वो सिखाता है कि जीवन में
चलते रहना ही असली सफर है।


लेखिका के बारे में-
डॉ. रुपाली गर्ग
एक शिक्षिका, लेखिका और साहित्य साधिका हैं, जिन्होंने बरेली विश्वविद्यालय से पीएचडी तथा चेन्नई से MBA किया है।वे पिछले 2 वर्षों से लेखन में सक्रिय हैं और अब तक 300 से अधिक रचनाओं का सृजन कर चुकी हैं।
उनकी लेखनी में स्त्री, जीवन, वियोग और अनुभवों की गहराई झलकती है, साथ ही उन्हें जासूसी और दर्शनशास्त्र आधारित साहित्य पढ़ना विशेष रूप से पसंद है।
उनकी रचनाएँ 500+ साझा संकलनों व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, तथा वे कई साहित्यिक सम्मेलनों की गरिमा बढ़ा चुकी हैं. साथ ही उनकी 2 पुस्तकें प्रकाशित हैं और वे विभिन्न साहित्यिक मंचों पर उपाध्यक्ष एवं सह-संस्थापिका के रूप में सक्रिय हैं।


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