
अर्चना जैन, जयपुर
पानी तो दोनों में था
झरना हो या समुंदर,
मुझे हमेशा झरना ही भाया।
ऊँचाई से गिरता,
तन-मन भिगोता,
खुद में आत्मसात करता।
समुंदर तो आता
एक मनचले आशिक की तरह,
छूकर चला जाता,
मन को कभी छू न पाया।
समुंदर आता,
तो छोड़ जाता रेत रूपी निशान
बदन पर।
झरने ने तो हमेशा
साफ की तन पर जमी मिट्टी,
जैसे कोई सच्चा आशिक
आपकी कमियों को दूर करता है।
पानी भले ही हो दोनों में,
पर तासीर मुझे
झरने की ही भाती है।
लेखिका के बारे में –
अर्चना जैन
जयपुर (राजस्थान) की निवासी, B.Com स्नातक और संवेदनशील लेखिका हैं।उन्हें लेखन और पठन में विशेष रुचि है, जो उनकी रचनाओं में सहज रूप से झलकती है।इनकी कविताएँ विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।इनकी पहली काव्य पुस्तक ‘पौनी सी ही चखी ज़िन्दगी’ जीवन के गहरे अनुभवों का सजीव चित्रण प्रस्तुत करती है। इस पुस्तक में रिश्तों, भावनाओं और जीवन की सच्चाइयों को सरल, सहज और हृदयस्पर्शी शब्दों में पिरोया गया है।राजस्थान की समृद्ध संस्कृति और रंग इनके लेखन को विशेष पहचान देते हैं।इनकी हर रचना में संवेदनाओं की एक नई परत खुलती है, जो पाठकों के मन को छू जाती है। अर्चना जैन का लेखन न केवल भावनाओं का प्रतिबिंब है, बल्कि जीवन को समझने और महसूस करने का एक सुंदर माध्यम भी है।
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सुंदर अभिव्यक्ति 🙏💐
वाह👌👌
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति 👌👏