
अपूर्वा, बिजनौर (उत्तरप्रदेश)
अस्पताल के पास
होने चाहिए फूल, तितलियाँ, दरख़्त,
ताकि कड़क धूप में
बनी रहे थोड़ी-सी छाँव।
भीतर तक उतरती रहे खुशबू,
और जमा हुआ दुख
उड़ता रहे तितली की तरह।
अस्पताल के अंदर
होनी चाहिए गुब्बारों, खिलौनों
और किताबों की दुकान।
जीवन-रस का आख़िरी घूँट पीता पथिक
चाहता है
उम्मीद या मुक्ति का कोई रंग।
हर प्रिस्क्रिप्शन पर
मिलना चाहिए एक गुब्बारा,
ताकि दर्द भरकर
उड़ाया जा सके आसमान में।
अस्पताल की कतारों में खड़े
सुनाना चाहिए एक गीत—
“कहाँ तक ये मन को अँधेरे छलेंगे,
उदासी भरे दिन कभी तो ढलेंगे।”
लेखिका के बारे में-
अपूर्वा
समकालीन हिंदी साहित्य की एक संवेदनशील और सशक्त आवाज़ हैं, जिनकी लेखनी में भावनाओं की गहराई और विचारों की परिपक्वता सहज रूप से दिखाई देती है। 16 दिसंबर 1994 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर में जन्मी अपूर्वा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की। साहित्य के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें विविध विधाओं कविता, डायरी अंश, संस्मरण और समीक्षा में सृजन करने के लिए प्रेरित किया। उनकी रचनाएँ नया ज्ञानोदय, मुक्तांचल, गगनांचल, सृजनलोक, समकालीन अभिव्यक्ति, बाल भारती, कवितांजलि, सृजन कुंज, पब्लिक इमोशन तथा अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके साथ ही, उनके शोध पत्र भी विभिन्न अकादमिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर उनके बौद्धिक पक्ष को सुदृढ़ करते हैं। उनका प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘स्मृति नाद’ उनकी रचनात्मकता का जीवंत प्रमाण है, जिसमें स्मृतियों और संवेदनाओं का सुंदर ताना-बाना बुना गया है। वर्तमान में अपूर्वा शोध कार्य में संलग्न हैं और निरंतर साहित्य साधना के माध्यम से अपने सृजन को नई ऊँचाइयों तक ले जा रही हैं।
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