अस्पताल के पास
यह कविता अस्पताल जैसे गंभीर माहौल में भी उम्मीद, संवेदना और जीवन के छोटे-छोटे रंगों की आवश्यकता को बेहद भावपूर्ण तरीके से व्यक्त करती है।

यह कविता अस्पताल जैसे गंभीर माहौल में भी उम्मीद, संवेदना और जीवन के छोटे-छोटे रंगों की आवश्यकता को बेहद भावपूर्ण तरीके से व्यक्त करती है।
मेरे जीवन की वाड़ी, जिसे मैंने प्रेम और समर्पण से सींचा, फूलों-सी महकी और पत्तों-सी निखरी। भौंरे उसकी मिठास में आकर्षित होकर अपने हिस्से का रस ले गए। मैंने जिन लोगों को अपना मानकर आगे बढ़ने का हिस्सा बनाया, उनका साथ भी किसी उद्देश्य से था—पर वे सगे नहीं थे, और समय ने उनके असली चेहरे दिखा दिए। उनकी ज़रूरतें और इच्छाएँ अधिक थीं, और जब तक मैं काम आता, वही काफी था। फिर भी, हौसलों को बुलंद रखकर, नेक काम करके, आगे बढ़ जाना ही सही राह है।