भंँवरे ने खिलाया फूल, फूल को ले गया राज कुंँवर….

वारी बनी पुष्प वाटिका, जब जब सींचा मैंने,

पात पात निखर गए, खुशबू जहांँ में फैले,

मंँडराते भौंरे सम्मोहित, अपने जाल बिछाए,

मेरे मधुबन के मधुरस वो, अपने हिस्से लाए,

अपना उपवन अपनी मंशा, कुछ उद्देश्य रहा था,

दूर तलक साथ था चलना, हिस्सा जिन्हें बनाया,

युक्ति और धरोहर मेरे , थे मैंने ही बनाए,

 सगे कहांँ थे वो मेरे, नकाब उतर ही जाए।

उनकी थी जरूरत ज्यादा, उनकी कुछ चाहत होगी,

काम आ जाएंँ जब आप, बात इससे क्या बड़ी होगी,

आगे बढ़ने की ताकत, बुलंद हौसले कर जाएंँ,

नेकी कर दरिया में डाल, इन राहों पर यारब चल जाएंँ।

डॉ निवेदिता श्रीवास्तव ‘गार्गी’, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर

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