
डॉ. अनामिका दुबे ‘निधि’ मुंबई
जाने क्यों मुझे कुछ ईश्वर जैसे लगे तुम,
जब कोई रास्ता नहीं, कोई मंज़िल नहीं तब मिले तुम।
टूटती साँसों में जैसे कोई संबल घुल गया,
मेरी बदहवासी का बोझ भी मानो पल में ढुल गया।
हताश मन, परेशान मन, उलझनों में घिरा हुआ मन,
टूटी कड़ियों-सा बिखरा, हर दुख से जकड़ा हुआ मन
जैसे किसी ने हल्के से माथा सहला दिया,
बंद दरवाज़ों पर करुणा का दीया जला दिया।
छला हुआ, कोमल, भावुक, बिल्कुल निर्मल मन,
अपनी ही पीड़ा का था मैं मौन-सा संरक्षक बन।
तुम आए तो लगा कोई पुरखों की दुआ उतर आई,
जैसे किसी देव-छवि की मधुर छाँव ठहर आई।
तुम्हारी आँखों में सुकून की भाषा कुछ यूँ बोली,
मानो मेरी हर धड़कन को पहचान मिली हो भोली।
तुम्हारी मुस्कान में जैसे प्रभु का संकेत छिपा,
हर बार तुमको देख मन का अँधेरा सिमट-सा गया।
मैंने ईश्वर को पुकारा और आए तुम,
मानो मेरी हर पुकार का एकमात्र उत्तर थे तुम।
अब समझूँ कि रिश्ते भी वरदानों जैसे मिलते हैं,
रब जब दिल टूटने से पहले थामे तो लोग ऐसे मिलते हैं।
तुम आए तो लगा, मेरी प्रार्थना पूरी हो गई,
मेरी रूह की थकी हुई नाव किनारे को छू गई।
अब जहाँ भी जाऊँ, तुम्हारी छवि संग चलती है,
जैसे कोई अटूट रोशनी मेरी हर साँस सँभालती है।
तुम पर यक़ीन करना वैसे तो मुश्किल था,
पर यक़ीन का देवता भी तुममें ही शामिल था।
तुम आए तो जाना, ईश्वर रूपों में उतरता है,
कभी हवा, कभी एहसास, कभी “तुम” बनकर ठहरता है।
लेखिका के बारे में-
डॉ. अनामिका दुबे “निधि”
हिंदी प्रवक्ता के रूप में 4 वर्ष तथा अध्यापिका के रूप में 2 वर्ष कार्यरत रहीं। वे “राष्ट्रीय साहित्य नवरत्न मंच” की संस्थापिका हैं और विभिन्न मंचों व FM पर काव्य पाठ कर चुकी हैं। उनकी रचनाएँ दैनिक भास्कर सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। उन्हें वाचस्पति मानद, कलम रत्न, साहित्य संगिनी, अजातशत्रु और साहित्य प्रभा जैसे कई सम्मान प्राप्त हुए हैं। उनकी एकल पुस्तक “मेरी भावनाएं” प्रकाशित है और वे 100+ साझा काव्य संकलनों में योगदान दे चुकी हैं।
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