फिर खुद को पाना

आईने में खुद को देखता व्यक्ति, आत्ममंथन और खुद से प्रेम का प्रतीक

कंचनमाला अमर उर्मी, नई दिल्ली

कहां तक ख़ुद से नज़रें यूं चुराएं,
चलो अब आइने से दिल लगाएं।

सितारों के जहां में जा चुके जो,
कहो कैसे उन्हें हम तो भुलाएं।

जो भटकी सी हुई है नस्ल अपनी,
सदा देके उन्हें वापस बुलाएं।

है ये गमगीन दिन और रात मेरे,
चलो इक ख़्वाब रंगीं फ़िर सजाएं।

कि यूं मायूसियों को दे धता हम,
चलो खुद से ही खुद की कुछ बताएं ।

जिंदगी की सज़ा अब काटनी है,
जो बचने के हैं रस्ते ,तो सुझाएं।

हमें ख़ुद से मोहब्बत हो गई है,
मुझे मदहोश करती कहकशाएं।

लेखिका के बारे में-

कंचनमाला ‘अमर’ (उपनाम: उर्मी) 
एक बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार एवं शिक्षिका हैं, जो नई दिल्ली के राजकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में विज्ञान विषय का अध्यापन करती हैं। उन्होंने M.Sc. (रसायन शास्त्र), M.Ed, M.A (कंठ संगीत) तथा B.A (कत्थक नृत्य) की उच्च शिक्षा प्राप्त की है और वर्तमान में शिक्षा शास्त्र में शोधरत हैं।
उनका एकल काव्य संग्रह “इसी रहगुज़र से” सहित कई साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं तथा अनेक प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें माखनलाल चतुर्वेदी नव उदय साहित्य सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।


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