तेरे मेरे दरमियां…
कभी-कभी मोहब्बत दूरियों में भी सांस लेती है। यह ग़ज़ल उसी ख़ामोश प्रेम, अधूरी चाहत और दिल में ठहरी ख़लिश की कहानी कहती है।

कभी-कभी मोहब्बत दूरियों में भी सांस लेती है। यह ग़ज़ल उसी ख़ामोश प्रेम, अधूरी चाहत और दिल में ठहरी ख़लिश की कहानी कहती है।
यह ग़ज़ल आत्ममंथन, खोई हुई उम्मीद और फिर खुद से प्रेम करने की यात्रा को बेहद खूबसूरती से बयां करती है।
राँची, झारखंड की कवयित्री अर्पणा सिंह की यह मार्मिक ग़ज़ल प्रेम, विरह, तड़प और आत्मिक समर्पण की गहराइयों को उजागर करती है। “ज़िंदगी में तुम नहीं तो ज़िंदगी कुछ भी नहीं” पंक्ति के माध्यम से प्रेम की पूर्णता और विरह की पीड़ा का संवेदनशील चित्रण किया गया है।