
अर्पणा सिंह, प्रसिद्ध लेखिका, रांची (झारखंड)
ज़िंदगी में तुम नहीं तो ज़िंदगी कुछ भी नहीं,
बाद तेरी चाह के ये बंदगी कुछ भी नहीं।
नाम तो हर वक्त होंठों पर ही रहता है तिरा,
जी रही मर मर के हूँ ये खुदकुशी कुछ भी नहीं।
भूल बैठी उस खुदा को जिसने है पैदा किया,
अब न कहना के मिरी ये आशिकी कुछ भी नहीं।
अश़्क के दरिया बहे पर फिर भी मैं प्यासी रही
सामने दीदार के ये तिश्नगी कुछ भी नहीं।
दिख रही है इन उजालों में तिरी परछाइयां,
हो रही दीदार अब ये तीरगी कुछ भी नहीं।
हर दर-ओ- दीवार पर तुम ही नज़र आते मुझे,
ये मुहब्बत है मिरी दीवानगी कुछ भी नहीं।
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