
गायत्री बंका, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई
पूरे दिन घर को संवारती हूँ,
फिर भी तुम्हारा ये कहना
“करती क्या हो पूरे दिन?”
मुझे अच्छा नहीं लगता॥
बच्चों की तस्वीरों को घंटों निहारना,
फ़ोन के इंतज़ार में बैठे रहना,
फिर उनका कहना, “बाद में बात करते हैं।”
मुझे अच्छा नहीं लगता॥
तुम्हारा सबसे हँस-हँस कर बात करना,
फिर मुझसे न बात करना,
घंटों तुम्हारा इंतज़ार करना
मुझे अच्छा नहीं लगता॥
अकेले रहकर थक गई मैं,
दीवारों को देख बिखर गई मैं।
अब इंतज़ार करना किसी का,
मुझे अच्छा नहीं लगता॥
पूरी ज़िंदगी दे दी मैंने ससुराल को,
कभी न सोचा मायके के बारे में।
फिर भी कफ़न मायके से ही मँगवाना
मुझे अच्छा नहीं लगता॥

बहुत बढ़िया गायत्री । आखिरी पैरा शानदार।
मेरे दिल की बात …. आपकी लेखनी ने कहा दी।
जी दिल से शुक्रिया आपका 🙏🏼
बहुत अर्थपूर्ण सच लिखा है आपने ।
पुरुष अपने घर की चारदीवारी से निकल कर कमाई के लिए जाता है तो उसका वातावरण बदल जाता है ।
एक गृहणी को सिर्फ घर के काम करने से खुशी नहीं मिल पाती ।
इस व्यथा को बहुत सच्चाई से उकेरा
गया , बधाई स्वीकार करें ।
जी दिल से शुक्रिया आपका 🙏🏼