हिज्र, सब्र और बदलते रिश्ते
यह ग़ज़ल सिर्फ मोहब्बत की कहानी नहीं, बल्कि खुद से मिलने का एक सफर है। इसमें हिज्र का दर्द है, सब्र की तपिश है और बदलते रिश्तों की कड़वी सच्चाई भी।

यह ग़ज़ल सिर्फ मोहब्बत की कहानी नहीं, बल्कि खुद से मिलने का एक सफर है। इसमें हिज्र का दर्द है, सब्र की तपिश है और बदलते रिश्तों की कड़वी सच्चाई भी।
राँची, झारखंड की कवयित्री अर्पणा सिंह की यह मार्मिक ग़ज़ल प्रेम, विरह, तड़प और आत्मिक समर्पण की गहराइयों को उजागर करती है। “ज़िंदगी में तुम नहीं तो ज़िंदगी कुछ भी नहीं” पंक्ति के माध्यम से प्रेम की पूर्णता और विरह की पीड़ा का संवेदनशील चित्रण किया गया है।