ग़ज़ल

चाँदनी रात में डायरी पर लिखी प्रेम ग़ज़ल, पास में रखा फाउंटेन पेन और हल्की रोशनी

उषा शर्मा, प्रसिद्ध लेखिका, जामनगर

तिरी पलकों के साये में फ़साना भूल जाते हैं,
कसम से जाने-जाना, हम ज़माना भूल जाते हैं।

बहुत होता सुकूँ जब नाम मेरा तुझसे है जुड़ता,
ज़ुबाँ से नाम अपना खुद बताना भूल जाते हैं।

उजाला कर लिया बाहर, मगर अंदर अँधेरा क्यों?
दिया क्या इल्म का दिल में जलाना भूल जाते हैं?

बुलंदी ठीक है, लेकिन कभी अपनों से मिलते जब,
अदब मिलने-मिलाने का दिखाना भूल जाते हैं।

अगर हों दूर अपनों से, खुशी के पल नहीं भाते,
वही अपने दुखों में साथ आना भूल जाते हैं।

जो उनको दर्द है दिल में, समझ पाते नहीं बच्चे,
वही माँ-बाप अक्सर मुस्कुराना भूल जाते हैं।

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