
डॉ. रत्ना मानिक, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर
तलाशती हूँ
तन्हाई और एकाकीपन के
कुछ बेहद विचारपूर्ण, मार्मिक,
नितांत एकांत क्षण,
जहाँ प्रकृति के
ममत्वपूर्ण वितान तले,
अनंता की गोद में सिर रखे,
नीलांबर की गर्म चादर ओढ़े
मैं समझ सकूँ दुनिया का गणित
और ख़ुद में ख़ुद को तलाश सकूँ।
ओस की बूंदों को चूमकर
अपनी आँखों के मोती लुटा सकूँ,
बगुलों के निष्छल, नरम पंखों पर
स्वप्नों की एक श्वेत शय्या सजा सकूँ।
और दुनिया की साजिशों को
रौंदकर पैरों तले
आत्मा का नैसर्गिक गीत गुनगुना सकूँ।
फागुनी मलयानिल बयार को
समेटकर अपने अंतस में,
अपने वजूद को
खुशबुओं का लिबास पहना सकूँ।
या फिर
तमाम तलाशों से मुँह मोड़कर
मन की उथल-पुथल को
यहीं कहीं सदा के लिए छोड़कर
हो जाऊँ विलीन दूर अनंत में कहीं
फिर कभी न लौटने के लिए…

Bahut acchi rachna
मन के भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति!