
कंचनमाला अमर उर्मी, नई दिल्ली
उम्र बढ़ती है, लेकिन ममता हमेशा जवान रहती है
माएं, जिनका पूरा जीवन अपने बच्चों की देखभाल में बीत जाता है, वही बच्चे बड़े होकर अपनी देखभाल खुद करना सीख जाते हैं. लेकिन धीरे-धीरे मां की वही चिंता उन्हें बोझ लगने लगती है. बच्चे चाहते हैं कि मां अब चुपचाप एक कोने में बैठी रहे, जबकि उसके मन में आज भी वही जिम्मेदारी और अपनापन जिंदा रहता है.
सुबह उठते ही मां को चिंता होती है कि कहीं सिंक में बर्तन तो नहीं पड़े हैं. अगर समय पर साफ नहीं हुए तो बच्चों को नाश्ता कैसे मिलेगा. घर के छोटे-छोटे कामों में भी वह अपने बच्चों की भलाई ही देखती है. कई माएं जीवन के अंतिम समय तक अपने बच्चों का हाथ बंटाना चाहती हैं.
वहीं बच्चे इस बात से डरते हैं कि कहीं मां गिर न जाए, बीमार न पड़ जाए, जिससे देखभाल और जिम्मेदारी बढ़ जाए. लेकिन सवाल यह है कि जब बच्चे छोटे थे और गिरते थे, तब क्या मां ने उन्हें चलने-फिरने से रोका था. फिर आज उसी मां को उसके जीवन के स्वाभाविक हिस्से से क्यों दूर किया जा रहा है.याद रखिए, मां ने अपने जीवन में बहुत कुछ इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वह आपकी परवरिश में लगी रही. अब समय है कि उन्हें खुलकर जीने दिया जाए. उन्हें वो सब करने दें, जो वे करना चाहती हैं. उनके सवालों का जवाब धैर्य से दें, भले ही कभी-कभी वह आपको परेशान करें. जैसे आप बच्चों के हर सवाल का जवाब देते हैं क्योंकि उनमें अपना भविष्य देखते हैं, वैसे ही आपकी मां ने भी कभी आप में अपना भविष्य देखा था. यदि असामयिक मृत्यु न हो, तो बुढ़ापा जीवन का अंतिम और अनिवार्य चरण है. इसे समझना और स्वीकार करना ही सच्ची संवेदनशीलता है.
लेखिका के बारे में-
कंचनमाला ‘अमर’ (उपनाम: उर्मी)
एक बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार एवं शिक्षिका हैं, जो नई दिल्ली के राजकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में विज्ञान विषय का अध्यापन करती हैं। उन्होंने M.Sc. (रसायन शास्त्र), M.Ed, M.A (कंठ संगीत) तथा B.A (कत्थक नृत्य) की उच्च शिक्षा प्राप्त की है और वर्तमान में शिक्षा शास्त्र में शोधरत हैं।
उनका एकल काव्य संग्रह “इसी रहगुज़र से” सहित कई साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं तथा अनेक प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें माखनलाल चतुर्वेदी नव उदय साहित्य सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।
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