जब प्रेम बन जाए समर्पण और साधना

सुरभि डागर
प्रेम को यहाँ जानता कौन है,
हृदय की यहाँ मानता कौन है।
प्रेम में मेघ धरा से मिला,
वर्षा की बूँदों में झूमकर
नाचता कौन है?
प्रेम को यहाँ जानता कौन है।
प्रेम में मीरा ने सब कुछ सहा,
मौन रही, सदा न लबों से कुछ कहा।
गोविंद को मीरा की आँख से
देखता कौन है?
प्रेम को यहाँ जानता कौन है।
प्रेम में गौरा ने जप-तप किया,
सर्दी-गर्मी सही, शिव ने शक्ति
को धारण किया।
स्त्री को अर्धांगिनी मानता कौन है?
प्रेम को यहाँ जानता कौन है।
प्रेम में नदियाँ मस्ती से बहती रहीं,
मार्ग जैसा मिला, उछलती रहीं।
खिल उठीं, सागर से मिलन जब हुआ
प्रेम को यहाँ जानता कौन है।
लेखिका के बारे में-
सुरभि डागर
एक संवेदनशील और बहुआयामी साहित्यकार हैं, जिनका जन्म 30 जनवरी 1986 को हुआ। हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने अपनी रचनात्मकता को एक सशक्त दिशा दी है। कविताएं, कहानियां, लेख और हाइकु जैसी विभिन्न विधाओं में उनकी सृजनात्मक अभिव्यक्ति समान रूप से प्रभावशाली है।
उनकी लेखनी में भावनाओं की गहराई, सामाजिक सरोकार और सहज भाषा का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।
वे शब्दों के माध्यम से जीवन के सूक्ष्म अनुभवों को जीवंत रूप देती हैं। उनकी रचनाएं पाठकों के मन को छूने के साथ-साथ विचारों को भी झकझोरती हैं।
उनकी प्रकाशित पुस्तक ‘सगुनचिरैया’ उनके साहित्यिक कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके अलावा उनकी रचनाएं अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हो चुकी हैं। वे निरंतर लेखन के माध्यम से साहित्य जगत में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। सुरभि डागर अपनी सृजनशीलता और अभिव्यक्ति से साहित्य प्रेमियों के बीच विशेष पहचान बना रही हैं।
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