
डॉ. अनामिका दुबे, मुंबई
इस हद तक ज़लील किया है उसने, क्या कहें हम,
ज़ख्म तो हरे ही रहे, नया ज़ख्म दिया उसने, क्या कहें हम।
हमने तो चाहा था बस थोड़ा सा सुकून दिल का,
हर ख़्वाब को बेरहमी से कुचल दिया उसने, क्या कहें हम।
वो जो अपना था, उसी से उम्मीदें थीं बहुत,
हर उम्मीद को खामोशी में दफ़्न किया उसने, क्या कहें हम।
हम तो अब भी उसी मोड़ पर खड़े हैं तन्हा,
रास्ता बदल लिया, मुड़कर न देखा उसने, क्या कहें हम।
दिल को समझाया बहुत, भूल जा उस शख़्स को,
पर हर धड़कन में नाम लिख दिया उसने, क्या कहें हम।
‘निधि’ अब शिकायत भी किससे करें आखिर,
अपना बनाकर ही अजनबी बना दिया उसने, क्या कहें हम।
लेखिका के बारे में-
डॉ. अनामिका दुबे “निधि”
हिंदी प्रवक्ता के रूप में 4 वर्ष तथा अध्यापिका के रूप में 2 वर्ष कार्यरत रहीं। वे “राष्ट्रीय साहित्य नवरत्न मंच” की संस्थापिका हैं और विभिन्न मंचों व FM पर काव्य पाठ कर चुकी हैं। उनकी रचनाएँ दैनिक भास्कर सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं।
उन्हें वाचस्पति मानद, कलम रत्न, साहित्य संगिनी, अजातशत्रु और साहित्य प्रभा जैसे कई सम्मान प्राप्त हुए हैं।
उनकी एकल पुस्तक “मेरी भावनाएं” प्रकाशित है और वे 100+ साझा काव्य संकलनों में योगदान दे चुकी हैं।
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