
आशीष सोलंकी, गरोठ
मां यह शब्द ही किसी इंसान के लिए काफी होता है। इस एक शब्द में पूरी दुनिया समाई है। दुनिया की दौलत इस नाम में है। जीवन की शुरुआत इसी नाम से होती है। तकलीफों में यह मरहम है, एक सुरक्षा है, एक ऐसा एहसास है जो हमें बताता है कि हम कितने खास हैं। यह हमारी पहली पाठशाला है।
ऐसा ही एक नज़ारा मैंने पिछले मदर्स डे पर देखा। उस दिन शहर में तेज हवाओं के साथ मूसलाधार बारिश हो रही थी। मैं अपने कमरे की बालकनी में खड़ा चाय पी रहा था। हवाएं इतनी तेज थीं कि उसमें खड़ा रहना भी मुश्किल था। पेड़ ज़ोर-ज़ोर से झूम रहे थे।
तभी मेरी नज़र पास के एक मकान पर बैठी एक चिड़िया पर पड़ी। वह अपने घोंसले में बैठी थी और तेज हवा और बारिश से जूझ रही थी। पहले मुझे समझ नहीं आया कि वह भीग क्यों रही है, लेकिन फिर देखा कि उसने घोंसले में अंडे दिए हुए हैं। वह अपने मां होने का फर्ज़ निभा रही थी।
वह अपने अंडों पर एक सुरक्षा कवच की तरह बैठी थी। वह एक पल के लिए भी टस से मस नहीं हुई। उसे चिंता थी अपने उन बच्चों की, जो अभी इस दुनिया में आए भी नहीं थे। और वह यह भी जानती होगी कि एक दिन यही बच्चे, पंख निकलते ही, उसे छोड़कर चले जाएंगे।
उस दिन मैंने एक मां को देखा – उसका निस्वार्थ प्रेम देखा।
उस चिड़िया को न अपनी फिक्र थी, न आने वाले कल की। उसे तो बस अपने बच्चों पर मंडराते खतरे की चिंता थी। मैं यह सब देख रहा था, और मेरा दिल भर आया। उस दिन उस पक्षी ने मुझे सच मायनों में एक मां की भाषा समझाई।उस दिन यह जरूर समझ आया कि मां का प्रेम निस्वार्थ होता है… लेकिन क्या यह इंसानों में भी उतना ही है?
लेखक के बारे में –
आशीष सोलंकी
एक संवेदनशील और बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं।पेशे से आईटी इंजीनियर होते हुए भी उन्होंने रचनात्मकता को अपनी पहचान बनाया है।तकनीक और साहित्य दोनों क्षेत्रों में उनका संतुलन उन्हें खास बनाता है।कविता, कहानी और संस्मरण लेखन में उनकी गहरी रुचि झलकती है।उनकी रचनाओं में भावनाओं की सादगी और जीवन की सच्चाई दिखाई देती है।वे शब्दों के माध्यम से आम जीवन के खास पहलुओं को उजागर करते हैं।लेखन के साथ-साथ वे एक शौकिया फोटोग्राफर भी हैं।
कैमरे के जरिए वे पलों को सहेजने की कला बखूबी जानते हैं।उनकी तस्वीरें भी उतनी ही भावनात्मक होती हैं जितनी उनकी रचनाएं। आशीष सोलंकी तकनीक और संवेदनाओं का सुंदर संगम हैं।

सुंदर अभिव्यक्ति
बहुत धन्यवाद