
नीमा शाह, अहमदाबाद
अगर सच में उतरना है तुम्हें मेरी नस-नस में,
तो यूँ ही नहीं…
मेरे हर एहसास में ठहरना होगा।
मैं भी शायद यूँ ही
धीरे-धीरे तुम्हें जीने लगूँ…
साँसों में, ख़्वाबों में, धड़कनों में।
फिर एक दिन ऐसा भी आए—
कि मुझे खुद को ढूँढने के लिए
तुम्हारे दिल में उतरना पड़े…
क्योंकि मेरी हर नस में
तुम्हारा ही नाम बहने लगे।

नीमा शाह जी की बेहद खूबसूरत रचना सुनो साहिब…प्रेम में डूबी लाजवाब ख्वाहिश