प्रकृति के बीच खड़ी मुस्कुराती महिला

तेरे आँगन का उजियारा…

यह कविता प्रेम की उस कोमल अनुभूति को व्यक्त करती है, जहाँ प्रिय का सौंदर्य प्रकृति के हर रूप में झलकता है। कभी वह सूरज की उजास बनकर सामने आता है, तो कभी झरने की मधुर ध्वनि सा मन को स्पर्श करता है।

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कैक्टस

वो कभी तन्हा न लगता है, गमले में भी कितना ख़ुश रहता है… कैक्टस की तरह जो जीवन की हर सख़्ती में भी मुस्कुराता है। न धूप की शिकायत, न छाँव की उम्मीद—बस अपनी मौजूदगी में जीता हुआ एक प्रतीक उम्मीद का।

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