तेरे आँगन का उजियारा…

प्रकृति के बीच खड़ी मुस्कुराती महिला प्रकृति के बीच खड़ी मुस्कुराती महिला

सौंदर्य और प्रेम से सजी हिंदी कविता

डॉ. रुपाली गर्ग, मुंबई

मानो सूरज थककर बैठा तेरे ही आँगन में,
जैसे उजियारा बिखर गया हो तेरे ही दामन में।

तेरी हँसी लगे जैसे झरना पर्वत से उतरा हो,
मानो हर स्वर में मधुर राग कोई गहरा हो।

जैसे पलकें हों बादल की कोमल सी परछाई,
मानो उनमें छिपी हुई हो सावन की रुनझुनाई।

तेरी चाल लगे जैसे लहरें सागर की गाती हों,
मानो धरती खुद तुझको छूने को इठलाती हो।

जैसे फूलों ने रंग चुराए तेरे ही गालों से,
मानो खुशबू ने जन्म लिया हो तेरे ख्यालों से।

लगता है जैसे तू कोई स्वप्न सजीव बना,
मानो सृष्टि ने खुद तुझमें अपना रूप तना।
लेखिका के बारे में-
डॉ. रुपाली गर्ग
एक शिक्षिका, लेखिका और साहित्य साधिका हैं, जिन्होंने बरेली विश्वविद्यालय से पीएचडी तथा चेन्नई से MBA किया है।
वे पिछले 2 वर्षों से लेखन में सक्रिय हैं और अब तक 300 से अधिक रचनाओं का सृजन कर चुकी हैं। उनकी लेखनी में स्त्री, जीवन, वियोग और अनुभवों की गहराई झलकती है, साथ ही उन्हें जासूसी और दर्शनशास्त्र आधारित साहित्य पढ़ना विशेष रूप से पसंद है।उनकी रचनाएँ 500+ साझा संकलनों व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, तथा वे कई साहित्यिक सम्मेलनों की गरिमा बढ़ा चुकी हैं। उन्हें 300 से अधिक सम्मान, 20 पुरस्कार और 31 ट्रॉफियाँ प्राप्त हुई हैं, साथ ही उनकी 2 पुस्तकें प्रकाशित हैं और वे विभिन्न साहित्यिक मंचों पर उपाध्यक्ष एवं सह-संस्थापिका के रूप में सक्रिय हैं।


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