
रेनु शब्दमुखर, जयपुर
हँसती हुई स्त्रियों के कपोलों पर
सजी हैं मुस्कान की लहरें,
झील के शांत पानी में जैसे
कमल की पंखुड़ियाँ खिलें।
उनकी आँखों में बसते हैं
सपनों के सुंदर चिराग,
प्रेम की किरणें बिखेरतीं,
ज्यों सूरज की पहली आभा।
हँसती हुई स्त्रियां हैं जैसे
प्रकृति का अनुपम उपहार,
उनकी हँसी में छिपा है जैसे
प्यार का अनमोल संसार।
उनके हृदय की धड़कनें
कहानियाँ सुनातीं मीठी-मीठी,
हर पल, हर क्षण में झलके
जीवन की मधुर सी प्रीति।
हँसती हुई स्त्रियां अनायास ही
मन को छू लेती हैं,
बिन कहे ही प्रेम की भाषा
संसार को सिखा देती हैं।
उनकी मुस्कान में बसी हैं
खुशियों की अनगिनत बातें,
प्रेम का संदेश लाती हैं
जैसे रंगीन तितलियों के पंख।
हँसती हुई स्त्रियों में संसार हँसता है,
भूल जाती हैं अपने ग़मों को,
और अपनों के साथ ठहाकों में
दुखों को तिलांजलि देते हुए
सबका जीवन सुगंधित करती हैं।
लेखिका के बारे में-
रेनू ‘शब्दमुखर’
एक अंतरराष्ट्रीय अवार्ड विजेता साहित्यकार, समाजसेवी, कवयित्री एवं मंच संचालक हैं, जो हिंदी साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। वर्तमान में वे ज्ञानविहार स्कूल में हिंदी विभागाध्यक्ष तथा सम्पर्क साहित्य संस्थान, जयपुर में महासचिव समन्वयक के रूप में कार्यरत हैं। टीवी, रेडियो और विभिन्न राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ, कहानियाँ और लेख निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं। “अनकहे शब्द” सहित अनेक काव्य संग्रहों व संपादित पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। साहित्य सेवा, नारी सशक्तिकरण और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया है।
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आभार
हंसती हुई स्त्रियां कविता के लिए रेणु जी को बधाई ,सुंदर सकारात्मक रचना