
संध्या यादव, मुंबई
अलमारी बदलने लगी थी अचानक-
ब्लू, सफेद, ग्रे और ब्राउन की सादगी की जगह
रंग-बिरंगे कपड़ों ने ले ली थी।
शर्ट की जगह टी-शर्ट,
पैंट की जगह जींस आ गई थी।
रंगीन, ब्रांडेड शीशियों में कैद परफ्यूम की महक
अब घर के कोनों तक फैलने लगी थी।
लेदर शूज़ की जगह स्पोर्ट्स शूज़,
और मनपसंद भोजन की जगह
सलाद, सूप और प्रोटीन ने ले ली थी।
“मन बदलने की चाह में संवेदनाएँ दाँव पर नहीं लगनी चाहिए”
बदलाव इस सूत्र से हमेशा ही अनजान रहा…
परिवर्तन प्रकृति का नियम है,
पर जब वह नींव हिलाने वाला हो,
तो सब छोड़ मैदान में उतर जाना
हमेशा संभव नहीं होता।
मोबाइल की रिंगटोन पर शुरू हुई बेचैनी
अब साइलेंट की खामोशी में भी चीखने लगी थी।
चुप्पी अक्सर ज़्यादा शोर करती है।
आपत्ति दबे पाँव ही आती है,
शोर तो नौटंकियाँ करती हैं…
और फिर एक दिन—
वो समस्या घर चली आई।
वो आत्ममुग्ध थी,
उसके रोम-रोम से विजय झलक रही थी,
और मेरी गृहस्थी की दरारों में
मेरी ही टूटन के पसीने की बूँदें चमक रही थीं।
दयनीयता कृपा नहीं इंसानियत चाहती है,
और अहंकार के शब्दकोश में
ऐसे अर्थहीन शब्द नहीं होते…
वो मेरे पति की प्रेमिका थी।
सामान्य चेहरा,
मर्दाना चाल-ढाल,
पर आत्मविश्वास से लबरेज़।
अतिआत्मविश्वास
खोखले व्यक्ति को आक्रामक बना देता है
पढ़ा था, अब साक्षात देख रही थी…
मेरा पति अब उसके लिए
रोमांटिक गीत गुनगुनाता था
“जनम-जनम का साथ है हमारा तुम्हारा…”
और मैं-
इस जनम के अगले कुछ वर्षों को बचाने के लिए
मन्नतों, मंत्रों और उम्मीदों के सहारे
अपने टूटते विश्वास को जोड़ने की कोशिश करती रही।
उसके रोमांटिक गीतों की लय जितनी गहरी होती गई,
मेरे मंत्र उतने तेज हो गए।
हारा हुआ इंसान पहले ईश्वर की शरण में जाता है,
और उसके बाद भाग्य के नाम पर आँसू बहाता है…
खुद को आईने में तलाशना शुरू करते हुए
मैंने जाना-
विश्वास और आस्था की नींव को
जिस मिट्टी से मजबूत कर रही थी,
वो मिट्टी मेरे चेहरे के नमक को
चट कर चुकी थी।
एक दिन हँसते-हँसते
कह भी दिया एक पुरुष मित्र से
“मुझे एक पुरुष की नज़र से देखो
और मेरी खामियाँ गिनाओ…”
जवाब आज तक नहीं मिला—
पर सवाल अब भी कायम है।
सवाल जिंदा होने की निशानी हैं…
हर रात
मेरा पति मेरे शरीर में
किसी और को ढूँढ़ता रहा,
और मैं
अपने ही शरीर से बाहर बैठी,
जीवन और जिम्मेदारियों का
कभी याद न होने वाला
नौ का पहाड़ा रटती रही।
सुबह के नाश्ते,
ट्रेन की भीड़,
और रोज़मर्रा की थकान में
अपने अस्तित्व को बचाने की कोशिश करती रही।
मेरा अस्तित्व
कुएँ के बाहर बाल्टी से बंधी रस्सी सा था
सबकी आस मुझसे ही थी…
सूखे कुएँ से भी पानी लाना
मेरी ही जिम्मेदारी थी।
वो सोता रहा
विजेता की तरह,
और मैं
घर की खामोशी को समेटती रही।
खामोशी बेआवाज़ नहीं होती
चीख तक पहुँचने का पहला पायदान
खामोशी ही है।
बचना चाहिए… डरना चाहिए
ऐसी खामोशी से…
उसकी प्रेमिका सब जानती थी।
वो भी एक औरत थी
एक पत्नी, एक माँ…
पर उसने कहा-
“मैं बाज़ार हूँ,
और हर पुरुष ग्राहक।
प्रेम तो बस मेरा विज्ञापन है।”
उस दिन समझ आया-
ये सिर्फ मेरा घर नहीं टूट रहा,
ये तो रिश्तों का पूरा ढाँचा ही दरक रहा है…
परिवार ने इसे किस्मत कहा,
दोस्तों ने कमजोरी,
और समाज ने रिवाज़।
पर मैं जानती हूँ-
ये रिश्तों का बाज़ार है,
जहाँ हर रिश्ता
किसी न किसी स्वार्थ की कीमत पर टिका है।
हर रिश्ता मरता है-
जो जितना नजदीकी, उतना अल्पायु…
वेंटिलेटर पर पड़े रिश्ते
दिखावा, समाज, परिवार, मजबूरी, मोह की नलियों से
कब तक, कितना ऑक्सीजन खींच पाएँगे?
मेरी पीड़ा का कारण
कोई व्यक्ति विशेष नहीं है-
मेरी पराजय उस दुनिया में है
जहाँ प्रेम आज भी इतना परिपक्व नहीं हो पाया
कि स्वयं-प्रचारित
“ज़िंदगी के साथ भी ज़िंदगी के बाद भी”
जैसे खोखले नारों से आगे बढ़कर
स्वार्थ, झूठ, धोखे और धूर्तता के
चमकीले गिफ्ट रैपर को पहचान सके…
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पति पत्नी के संवेदनशील रिश्ते की पद्य शैली में लिखी मर्मस्पर्शी कहानी बहुत सुंदर 👌
धन्यवाद सर