सुनहरा छाता

किसी को कुछ बताना भी नहीं चाहती थी। किसे बताती? कौन सुनता? आँसू तो पहले ही सूख चुके थे। वो बस उस सुनहरे छाते को देखती आगे बढ़ रही थी। शायद उसी छाते के नीचे थोड़ी गुनगुनी धूप मिले… बिना रोक-टोक… बिना बाँधन।
पर तभी एक चीख गूँजी। लोग भागकर इकट्ठे हुए। सायरन बजाती एम्बुलेंस आई और एक शरीर उठा ले गई। इस घर में उसी घर में जिसके लिए उसने अपना मायका छोड़ा… खून के रिश्ते छोड़े बस सन्नाटा फैल गया। राकेश काला चश्मा लगाकर आया और बस इतना कहा “सब ख़त्म हो गया।”

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आ अब लौट चलें

अब लगता है कि चलो लौट चलते हैं, क्योंकि हर पल अब बहुत भारी हो गया है। चारों ओर एक गहरी चुप्पी छाई हुई है, और हँसी भी किसी आरी में बंध गई जैसी लगती है। हंसते-हंसते शब्द अब बोझिल लगते हैं और रिश्तों की परछाइयाँ धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही हैं। उजाला घटता जा रहा है और समय की कठिनाइयाँ हर ओर महसूस होती हैं।

हमने समय के पार जाने की कोशिश की, एक-दूसरे का हाथ थामकर, बस एक तिनके के समान छोटा सा साथ पाने की कोशिश थी। लेकिन न कोई मँझधार आई, न तूफ़ान, न डोंगी डूबी, न मौसम लड़खड़ाया—फिर भी शब्दों की तुरपाई टूट गई और अपनापन पत्थर की तरह भारी लगने लगा।

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ठहर न सका वो प्रेम

सुबह का नशा धीरे-धीरे चढ़ा तो था, लेकिन शाम तक उतर गया। यह प्रेम भी कुछ वैसा ही था—जिसे टिकना चाहिए था, पर ठहर न सका। अजीब बात यह रही कि उसे भी तलाश थी और मुझे भी, लेकिन जब वह सामने खड़ा था, तब भी पता नहीं क्यों वह न जाने कहाँ गुम हो गया।

इसके बाद न कोई तलब बची, न कोई बेक़रारी। सब कुछ जैसे अचानक खत्म हो गया और मेरे भीतर की बेचैनियों को किसी ने एक ही पल में कुतर डाला। मुझे याद है, शायद वह कोई फकीर ही रहा होगा, जिसकी उपस्थिति ने मेरे मन को इस कदर सँवार दिया कि सब कुछ बदल गया।

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