आधुनिक रिश्तों में दूरी और भावनात्मक अकेलेपन को दर्शाता उदास प्रेम दृश्य

…जब मोहब्बत नुमाइश बन गई

अब मोहब्बत भी लिबासों की तरह हो गई है – रोज़ बदलती, ज़माने की रवायत बन चुकी। कभी जो खतों में दिल की धड़कनें उतरती थीं, अब वो सिलसिला कहीं खो गया है। प्यार की जगह नुमाइश रह गई है।

इश्क़ का मिज़ाज देखकर लगता है कि लोगों के पास अब बस फुरसत ही फुरसत है, लेकिन मोहब्बत की असल सदाएं कहीं गुम हो गई हैं। चाहत अब इबादत बनकर रह गई है, और वफ़ा के नाम पर धोखे मिलना किस्मत। आज दुआएं भी सिक्कों में लुटती हैं, अमीरी भी ज़लालत सी लगने लगी है। इरादों को गलत अंजाम देना दीवानों की हिमाकत कहलाता है और बिना वजह इल्ज़ाम लगाना, सियासत।

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आजन्म बिछोह

इस बार की यात्रा वैसी नहीं थी जैसी पहले हुआ करती थी। न तस्वीरें देखीं, न डायरी लिखी — मन एक अजीब उचाट, थका और शून्य में डूबा हुआ है। जूड़े के फूलों के बीच अब एक जोड़ी उदास आँखें महसूस होती हैं, जो स्मृतियों की तरह टंगी रह गई हैं। हर बार की तरह यह यात्रा आनंद नहीं, बल्कि एक सैलाब छोड़ गई — भावनाओं का, बिछोह का, और उस प्रेम का जो चुपचाप आता है और सब बहा ले जाता है। इस बार आषाढ़ केवल मौसम नहीं, एक डूबती आत्मा का रूप बन गया है। न प्रतीक्षा है, न वचन, न कोई सहारा — बस एक अंतहीन दूरी, जहाँ अगली मुलाकात की कोई संभावना नहीं। इस प्रेम की परिणति नहीं, केवल आजन्म बिछोह ही लिखा है।

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