डर नहीं, दहाड़

अनिता की यह कहानी एक सामान्य-सी नौकरी से शुरू होकर शक्ति, साहस और आत्मसम्मान की विस्फोटक लड़ाई में बदल जाती है। स्कूल डायरेक्टर की कुटिल नीयत, मानसिक खेल और डराने-धमकाने की हर कोशिश को ध्वस्त करते हुए अनिता जिस तरह अपने स्वाभिमान की रक्षा करती है, वह हर उस लड़की की आवाज बन जाती है जो कार्यस्थल पर चुपचाप अन्याय सहती है।

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राख में भी शेष चिंगारी

मैंने ठहरना सीखा है— क्योंकि भाग जाना हमेशा हार नहीं, पर ठहरना ही सच्ची जीत है। आँसुओं की छाँव में मुस्कराना मेरा स्वभाव है, और यही मेरी पहचान भी। धूप ने जलाया, आँधियों ने तोड़ा, फिर भी हर बार राख से उठी हूँ — अपनी ही चिंगारियों की गर्मी से। शब्दों के बाण चुभे, पर मैंने मौन को कवच बना लिया; समय की नदी में बहते हुए भी मैंने उफनाई लहरों पर बाँध बनने का साहस पाया।
टूटते चाँद की तरह कभी मन भी बिखरता है, पर उजाला कम नहीं होता। मैं जानती हूँ कि पीड़ा को शीतलता में कैसे बदलना है — जैसे मंदाकिनी बनकर अपने ही घावों को धोना। मैं नहीं भागती, क्योंकि हर ठहराव में मैं अपनी अस्मिता को फिर से गढ़ती हूँ। यही मेरी शक्ति है, यही मेरी पहचान।

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शिव की शिवा 

सम्पूर्ण वातावरण ढोल, ढाक और ताशों की लयबद्ध ध्वनि से गूँज रहा था। घर-घर से दुर्गा स्तोत्र और आरती के साथ शंख और घंटियों की आवाज़ें आ रही थीं। शारदीय नवरात्र और देवी दुर्गा मइया की भक्ति में शहर डूबा था।नौमी की संध्या-आरती के बाद मालकिन ने फलाहार किया और रेशमा को भी खाने दिया। रेशमा, जिसे बचपन से मालकिन ने गोद में रखा और नाम दिया था, उनकी हर बात और हर काम का अनुसरण करती थी।
शरद की ठंडी रात में, मालकिन ने खिड़की से देखा कि एक लड़की बेतहाशा भाग रही है — पीछे दो-तीन गुंडे उसका पीछा कर रहे थे। लड़की की पीठ और बाँह घायल थी। मालकिन तुरंत देवी माँ से प्रार्थना करती हुई उसके पीछे दौड़ीं।

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सिंदूर-खेला

पूजा पंडाल में ढोल की थाप गूँज रही थी। विसर्जन से ठीक पहले का दिन! लाल बॉर्डर की सफेद साड़ी में सजी महिलाएँ माँ दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर, एक-दूसरे की माँग और गालों पर रंग भर रही थीं।

भीड़ के बीच खड़ी रितुपर्णा बाहर से मुस्करा रही थी, मगर भीतर खालीपन था। कुछ महीने पहले पति ने शराब के नशे में घर से निकाल दिया था। अकेली रहती तो ठीक था, पर बच्चे की परवरिश? सोचकर दिल डूब जाता।

तभी उसकी नज़र पंडाल के कोने में गई—एक आदमी अपनी पत्नी पर चिल्ला रहा था। अगले ही पल गाल पर जोरदार थप्पड़! भीड़ ने देखा, पर सब चुप। औरत आँचल मसलती, आँखें झुकाए आँसू पोंछ रही थी।

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हमको सूरज है बनना

“हमको सूरज है बनना—चाहे जलना पड़े। अंधकार दूर भगाना, पाप मिटाना और जीवन में प्रकाश फैलाना ही हमारा प्रण है। यह कविता साहस, एकता और सेवा की प्रेरणा देती है।”

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नवरात्रि: भक्ति से शक्ति की यात्रा

“नवरात्रि केवल पर्व नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा है। यह हमें हमारे भीतर की सुप्त शक्ति को पहचानने, हर कठिनाई में छिपे वरदान को देखने और आत्मविश्वास से अंधकार को मिटाने की प्रेरणा देता है।”

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सच में वही दीपावली होगी

ज्योति सोनी “वैदेही ” अलवर ,राजस्थान दीपावली, अंधेरे रूपी शत्रु के विरोध में सैकड़ों दियों की क्रांति का त्यौहार है। किस तरह नन्हे-नन्हे दिए, अपने साहस को समेटकर पूरी शक्ति और हिम्मत से उस अंधेरे को चीरते हुए धीरे-धीरे जलते हैं, जिसने उन्हें चारों ओर से घेर रखा है। उस कमजोर सी बाती में कितनी…

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गहना

यदि तुम्हें गहना पहनना है तो बेशक पहनो, लेकिन उस नगीने को मत खोना, जिसकी पहचान समय ने तुम्हें बड़ी मुश्किल से कराई है। अब कुदालों की बाट देखना बंद करो और अपनी सुइयाँ उठाओ—वे सुइयाँ जिन्हें जन्म लेते ही तुम्हारे हाथों में थमाया गया था। जब प्यास बढ़े, तो इधर-उधर ताकना मत, बल्कि अपनी तुरपाई वाली सुइयाँ पैनी करो। उसी से निर्मल जल का स्रोत मिलेगा, कुआँ खुदो और अपनी प्यास बुझाओ। इतना करने के बाद भी जीत का जश्न मनाना मना है। जीत की सांसों में हार को भी पहचानो, जो तुम्हें सबसे भावुक पलों में पटखनी देती आई है। इस बीच, ओढ़ लो अपना आत्मविश्वास और अपने सबसे थके हुए दिन को अमर बना दो। जीवन का अभियान सालों में नहीं, बल्कि प्रत्येक दिन में छिपा है। यही सोचकर जीवन की धूप मांग लो और उसे अपने लिए माँगटीका बना दो। सबसे जरूरी है कि तुम अपने लिए हमेशा सुहागिन बने रहो।

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राष्ट्रनायक नरेंद्र मोदी

नरेंद्र मोदी केवल एक नेता नहीं, बल्कि भारत माँ के ऐसे सपूत हैं जिन्होंने संघर्षों की भट्टी में तपकर अपनी पहचान बनाई। जनसेवा उनके जीवन का धर्म है और राष्ट्रभक्ति उनकी पूजा।
मोदी ने अपने संकल्पों से भारत को नवयुग की ओर अग्रसर किया। हर कठिनाई के सामने साहस के साथ खड़े होकर उन्होंने जनता को विश्वास और आशा दी। उनका जीवन कर्म, सरदार पटेल के साहस और शिवाजी की वीरता की याद दिलाता है।

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क्यों है?

राह में काँटों का मंजर बिखरा पड़ा है, फिर भी दिल फूलों की ओर आकृष्ट होता है। दामन भले ही बेवफाई की कहानियों से भरा हो, फिर भी वफ़ाओं पर भरोसा कायम रहता है। उसकी पल-पल रूठने की आदत है, लेकिन नाज़-नखरों को उठाने में वह पीछे नहीं हटता। आँधी और तूफ़ान उसे रोक नहीं पाएंगे, फिर भी यह बात दिल को गर्वित करती है। हरी-भरी वादियों पर उसने लाल रंग डाला, और इसके बावजूद उसे क्षमा किया जाता है। समुंदर की गहराई नापने की कला है उसमें, फिर भी गोता लगाने से डरता है। रोज़-रोज़ बदलता चेहरा देखकर आइना भी हैरान रह जाता है।

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