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“वृंदावन में बाँके बिहारी मंदिर के बाहर श्रद्धालुओं की भीड़ और आध्यात्मिक वातावरण”

वृंदावन की पुकार

यह लेख एक ऐसी वृंदावन यात्रा का वर्णन करता है, जो केवल स्थान परिवर्तन नहीं बल्कि आत्मा से संवाद बन गई। बाँके बिहारी मंदिर के दर्शन, बरसाना की अनुभूति और यमुना तट की शांति ने इसे एक दिव्य अनुभव बना दिया।

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पोटली खुली नहीं, हृदय खुल गया

कथा विश्राम का वह क्षण केवल समापन नहीं था, वह कृष्ण–सुदामा की मित्रता का सजीव दर्शन बन गया। राजमहल के वैभव में अपने बालसखा को गले लगाते श्रीकृष्ण और काँपते हाथों में पोटली थामे सुदामा इस प्रसंग ने श्रद्धालुओं के हृदय पिघला दिए। बिना माँगे सब कुछ पा लेने वाली सुदामा की भक्ति और निष्काम मित्रता ने पंडाल में बैठे हर व्यक्ति की आँखें नम कर दीं।

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भरोसे से भगवान मिलते हैं : पूज्य श्री सुनीलकृष्णजी व्यास

श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास से परिपूर्ण वातावरण में श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस का आयोजन अत्यंत भावपूर्ण रूप से संपन्न हुआ। कथा स्थल पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। भजन-कीर्तन, जयघोष और हरि नाम के संकीर्तन से संपूर्ण पंडाल भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालुओं ने गहन एकाग्रता और भाव-विभोर मन से कथा श्रवण का पुण्य लाभ लिया।

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