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पोटली खुली नहीं, हृदय खुल गया

कृष्ण–सुदामा प्रसंग ने रुलाया पूरा पंडाल

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम एवं अंतिम दिवस पर जैसे समय थम-सा गया। कथा विश्राम का वह क्षण, जब भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की अमिट मित्रता का प्रसंग मंच से उतरा, केवल कथा नहीं रहा. वह सीधे श्रद्धालुओं के हृदय में उतर गया। पंडाल में बैठे सैकड़ों श्रद्धालुओं की आँखें नम थीं, कई तो अपने आँसू रोक ही नहीं पाए। यह दृश्य बता रहा था कि सच्ची मित्रता आज भी मनुष्य के भीतर सबसे गहरी संवेदना जगा देती है।

पूज्य श्री सुनीलकृष्ण जी व्यास (बेरछा वाले) ने जब सुदामा के फटे-पुराने वस्त्र, काँपते हाथों में बँधी पोटली और संकोच से झुकी आँखों का वर्णन किया, तब पूरा वातावरण मौन हो गया। और जैसे ही उन्होंने कहा—“मित्रता वह नहीं जो वैभव देखे, मित्रता वह है जो भाव पहचान ले,” तो श्रोताओं के हृदय भर आए।

श्रीकृष्ण का राजमहल, वैभव और ऐश्वर्य इन सबके बीच अपने बालसखा सुदामा को गले लगाना, उनके चरण धोना और बिना माँगे ही सब कुछ अर्पित कर देना यह प्रसंग आज के स्वार्थ से भरे समय में श्रद्धालुओं को भीतर तक झकझोर गया। कई बुज़ुर्गों ने कहा-“आज भगवान ने हमें याद दिला दिया कि रिश्ते पद से नहीं, प्रेम से चलते हैं।”

भावुक वातावरण के बीच निकली श्रीमद् भागवत पुराण शोभा यात्रा ने इस करुणा को उल्लास में बदल दिया। नगर के प्रमुख मार्गों से गुजरती शोभा यात्रा में भजनों की मधुर धुन पर श्रद्धालु झूमते रहे। कहीं पुष्पवर्षा हो रही थी, कहीं हाथ जोड़कर प्रभु को नमन। संपूर्ण नगर जैसे भक्ति और प्रेम में डूब गया।

शोभा यात्रा के दौरान संदीप अनोखीलाल फरक्या द्वारा की गई फ्रूटी जूस सेवा ने सेवा-भाव का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत किया। वहीं गायक नितेश दांगी के भजनों ने वातावरण को और अधिक भावपूर्ण बना दिया.हर शब्द में श्रद्धा, हर सुर में समर्पण था।

कथा विश्राम के पश्चात आयोजित विशाल भंडारा प्रसादी में हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। आयोजन समिति द्वारा पुलिस स्टाफ, विद्युत मंडल कर्मी, रंगोली कलाकारों एवं पत्रकार बंधुओं का सम्मान किया गया, जो यह दर्शाता है कि यह आयोजन केवल कथा नहीं, बल्कि सामूहिक सेवा और सहयोग का पर्व था।

सप्तम दिवस की आरती एवं प्रसादी के यजमान श्रीकांत जी गुर्जर (कान्हा जी भैया) रहे, जिनकी श्रद्धा और सेवा-भाव पूरे आयोजन में झलकता रहा।समापन अवसर पर श्रीराम हनुमान मंदिर समिति के अध्यक्ष श्री नारायण सिंह चौहान बापू ने भावुक स्वर में कहा- “यह कथा हमें सिखाकर गई कि यदि हृदय में सुदामा जैसा भाव हो, तो कृष्ण स्वयं दौड़े चले आते हैं।”

श्रीमद् भागवत कथा सप्ताह का यह समापन केवल एक धार्मिक आयोजन का अंत नहीं था, बल्कि यह उन आँसुओं का उत्सव था जो प्रेम, मित्रता और निष्काम भक्ति से निकले और हर श्रद्धालु के हृदय पर एक अमिट छाप छोड़ गए।

2 thoughts on “पोटली खुली नहीं, हृदय खुल गया

  1. उसने मुझे ऐसा बुलाया ।
    मैं गया, मैं लौट न पाया।।

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