पोटली खुली नहीं, हृदय खुल गया

कथा विश्राम का वह क्षण केवल समापन नहीं था, वह कृष्ण–सुदामा की मित्रता का सजीव दर्शन बन गया। राजमहल के वैभव में अपने बालसखा को गले लगाते श्रीकृष्ण और काँपते हाथों में पोटली थामे सुदामा इस प्रसंग ने श्रद्धालुओं के हृदय पिघला दिए। बिना माँगे सब कुछ पा लेने वाली सुदामा की भक्ति और निष्काम मित्रता ने पंडाल में बैठे हर व्यक्ति की आँखें नम कर दीं।

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river

नदी के आँसू

दी रोती भी है—पर पहाड़ उसकी आँखों के आँसू देख ही कहाँ पाते हैं। वो अपनी ऊँचाई की अकड़ में तने रहते हैं। उन्हें लगता है नदी तो बस बादलों की आवारा सखी है, बहती है, गुज़रती है… बस।

पर हक़ीक़त यह है कि पहाड़ की ऊँचाई को हरियाली, जीवन, शब्दसब कुछ नदी ही देती है। वही उसके अस्तित्व को अर्थ देती है। ऊँचाई अकेली कुछ नहीं होती गहराई चाहिए। और गहराई नदी ही देती है।

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भोर की प्रतीक्षा…

जाने कितने जंगलों को पार करती उसकी साँसें मेरे कानों से टकराई थीं। जैसे उसकी डूबती साँसें मुझे पुकार रही हों। मैं और मेरी साँसें उस निराकार ब्रह्मांड के शरणागत थे।एक कवियित्री की आँखों में खारे अश्क़ों की गहरी तरलता भरी थी। उन अश्क़ों ने मानो किसी देव के चरण पखारने की ठान ली थी। विशालकाय, हहराती गंगा में मेरे चंद खारे आँसू भी प्रार्थना में लीन थे।

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