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बदलते मौसम

यह कविता प्रेम में आए भावनात्मक बदलावों और रिश्ते की अनिश्चितताओं को बेहद कोमलता से व्यक्त करती है. प्रिय के बदलते व्यवहार को कवि बदलते मौसम से जोड़ता है. कविता में प्रेम, असुरक्षा, समर्पण और आपसी ज़रूरत की भावना गहराई से उभरती है. अंत में यह विश्वास व्यक्त होता है कि भले ही मौसम बदले, लेकिन सच्चे रिश्ते स्थिर रहते हैं.

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पोटली खुली नहीं, हृदय खुल गया

कथा विश्राम का वह क्षण केवल समापन नहीं था, वह कृष्ण–सुदामा की मित्रता का सजीव दर्शन बन गया। राजमहल के वैभव में अपने बालसखा को गले लगाते श्रीकृष्ण और काँपते हाथों में पोटली थामे सुदामा इस प्रसंग ने श्रद्धालुओं के हृदय पिघला दिए। बिना माँगे सब कुछ पा लेने वाली सुदामा की भक्ति और निष्काम मित्रता ने पंडाल में बैठे हर व्यक्ति की आँखें नम कर दीं।

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