
पुष्पा पाठक, प्रसिद्ध लेखिका, छतरपुर (मध्यप्रदेश)
बदलते मौसम को लखकर
कामिनी ने करवट बदली,
नेत्र तिरछे किये उसने
ना आनन से वह कुछ बोली ,
उद्गार छुपा कर सीने में
हृदय में नश्तर चला दिया
लगा जैसे कोई कतरा ,
ज़मीं पर जाकर बिखर गया ,
क्या देखा था क्या खोया था??
जो छोड़ा था मेरा संबल
तुम ही तो मेरी सहगामी
तुम्ही से जीवन है उज्जवल ।।
तेरे बिन जीना क्या जीना,
तेरे संग जीवन जीवन है,
सहारा मुझको दो इस पल
बनो तुम मेरी संजीवन।।
तेरे संग खुशियां खुशियां है
तेरी आंखें ही है दर्पण ।
तुझे पाया तुझे समझा,
यह जीवन तुझ पर है अर्पण।।
देख कर मेरी बेचैनी
ना तुम बदलो यू मौसम सी
मौसम भी बदलता जब
जरूरत होती जब उसकी।।
जरूरत तुमको मेरी है
जरूरत मैं तुम्हारी हूं,
रोज मौसम बदलता है
ना हम बदलेंगे एक पल भी।।

Wah bahut khub